Tuesday, 18 September 2018

गीतिका छंद---- परिचय

गीतिका छंद --*****
4 पदों का सरस छंद है --पत्येक पद में 26 मात्राएं
14 --12 में यति --पदांत में 2  1  2 (गुरु लघु गुरु)

3--10 --17 ---24  में लघु हो तो मिठास बढ़ती है । उदाहरण---
1     हे प्रभो आनंद दाता ,ज्ञान हमको दीजिये
      शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे  कीजिये ।
    लीजिये हमको शरण मे ,हम सदाचारी  बनें
       ब्रह्मचारी धर्म रक्षक, वीर व्रत धारी बने ।

2        धर्म के मग मेअधर्मी,से कभी डरना नही
    चेत कर चलना कुमारग,में कदम धरना नहीं।
       शुद्ध भावों में भयानक , भावना भरना नहीं
    बोध वर्धक लेख लिखने, में कमी करना नही।

Saturday, 15 September 2018

हरि गीतिका - क्रमांक 10

1       शुभ आगमन है सूर्य का,अब भोर वंदन हम करें
        दिनकी करें शुरुआत अब,आभार से शुभता भरें।
    तालाब में खिलते कमल,शीतल पवन सुखकर लगे
          होती सुबह की सैर तो,सेहत मिले मंजिल जगे।

2  गहरी निशा छाया तिमिर,रवि  किरण ही सब दुख हरे
       भेद कर तम दिन मान हो,नव सूर्य का अर्चन करें ।
              कोई जन्म लेता कहीं,कोई गमन करता यहीं
         कुछ फैसले भगवान ही ,करते यहां जो हम नहीं।

 
  3.     क्रम है चले जीवन मरण,कोई अमर रहता नही
        फल कर्म का पाते सभी,सबका रहे खाता बही ।
      माफी यहाँ मिलती नही,यह है नियम जग के लिये
       मानव करे सत्कर्म तो,सुखकर धरा सब के लिये .

4   हम नारियां मन में सदा,करती दुआ सब केलिये ।
   खुद सरित सी बहती रही, मिटती रही जग के लिये।
   रहती तृषित इनकी तृषा,पथ तृप्ति का जग के लिये
      यह दूब सी रहती अमर,बनके हरी जड़ को लिये ।

5    
[17/09, 09:50] डॉ चंद्रावती नागेश्वर: वह कारवां बढ़ता रहा,यह जिंदगी ढलती रहीं
मन कामना बन रेत कण ,वह खो गई तब से यहीं।
मन टूटते पथ छूटते,पर आस तो छूटे नहीं
बिखरे रहे उठ के हमीं,पहुंचे जहाँ  मंजिल  वहीं।

Wednesday, 12 September 2018

हरिगीतिका क्रमांक- 9

ब,1       मन है गहन हम तो चलें,गहरे उतर करके वहीं
      चुप तो रहें कुछ देर हम, बैठें जरा रुक कर कहीं ।
          बातें करें उससे कभी,आवाज फिर उसकी सुनें
     हर कदम पर वह साथ दे, संकेत की कड़ियाँ बुन
     

 

2   जीवन मरण तो चलता सदा,कोई अमर रहता नही
        फल कर्म का पाते सभी,सबका रहे खाता बही ।
     माफी यहाँ मिलती नही,यह है नियम जग के लिये
     मानव करे सत्कर्म तो,सुखकर धरा सब के लिये ।

4     यह देश है विकसित बहुत,अंग्रेज हैं वासी जहां
       है प्रेम सबको देश से, हैं लोग अनुशासित यहां।
       सब छल कपट से दूर हैं ,बेबात तो लड़ते नहीं
       पाबन्द ये हैं समय के ,पल पल समेटें हर कहीं।


5    तुम वंदना करते रहे,पथ कर्म का भूले सभी
     सबके हृदय में है वही,दिल में जरा देखो कभी।
   अपराध मानव खुद करे,दोष किस्मत को ही मढ़े
     वह सोचता खुद को चतुर,बचने बहाने वह गढ़े।

दोष किस्मत को ही दिया/दोष किस्मत को ही मिले
फिर भी वही शिकवा किया

 

Sunday, 9 September 2018

हरिगीतिका -क्रमांक --8

1              दहलीज से दूरी बढ़ी पग नापती बढ़ती रही
        मन मे लिये सपने चली ,नभ में उड़ी वह भी सही।
   मैं "से निकल वह "हम" बनी, तो आसमा सी हो गई
        ममता भरी गंगा बही, जग तारिणी वह बन गई ।

2      भगवान हो जायें सभी, मन में अगर सबके लिये
           सद्भावना मन मे रखें,दीपक बने सबके लिये।
       मन से बने मानव सभी हैं,मन से बली यह भूलते
         सब प्राणियों में बेहतर ,देह बल पर जो झूमते।

3          दहलीज से दूरी बढ़ी पग नापती बढ़ती रही
    मन के लिये सपने बुनी ,नभ में उड़ी वह तो सही।
"मैं "से निकल वह "हम" बनी, तो आसमा सी हो गई
      ममता भरी गंगा बही, जग तारिणी वह बन गई ।

4      : खुशबू लुटाती है वही,बांटे खुशी सबके लिये
    घर तो बने जन्नत उसी ,के जतन से जग के लिये।
   टुकड़ा वही मां के हृदय ,का  बन कली पलती रही
  ससुराल के सब दुख हरी, कुलतारिणी बन कर वही।

5  हैं शब्द के कुछ फूल मन, के बाग मेंअब तो खिले
     उत्साह में आकर वही, फिर छंद से जाकर मिले।
   मन तो गुनगुनाता तभी,दिल ये कली सी किलकती
     कल कल करे जब धार इस,की मुदित मन यह      
      छलकती।

Tuesday, 4 September 2018

हरिगीतिका -क्रमांक ---7


1           ये  वक्त तो बीते कहाँ, बरसात ही बैरी बनी
        जो रूप था मन मोहता,उससे हमारी अब ठनी।
   सोचे सभी हैं आज सब ,किस भूल की है यह सजा
        रोके हमीं बहती नदी,तब नहीं ली उसकी रजा ।


2        ताहो नगर की सैर को,हम लोग पहुंचे शाम को
          नमन के तट पर गये, देखा वहां जल धाम को।
            वह मौन सी मन भावनी ,बाहें पसारे सोचती
         अनुपम छटा के साथ में, हँस भानु को मोहती ।

  

 3      वन में झरें झरने कई,नदियाँ करें कल कल यहाँ
        इस झील में उतरे गगन,सौंदर्य है अनुपम जहाँ ।
       पहरा करें है अनगिनत ,सैनिक बने तरुवर खड़े
         वो पेड़ भाले सम लगे,हैं कोणवत ऊँचे बड़े।

4     मत  रोक  धारा सरित की ,है चाहती वह मचलना
       लग के गले वह भूमि के, रह संग में फिर उमड़ना।
           पर्वत सुता वह तो सदा ,नीरा सभी के दुख हरे
        हर जीव के संताप हर, तन मन यही शीतल करे।

       
   
   
5    जब गोद मे मां के तभी, तक भा रहा यह जग जिसे
      वह तरसता तेरे बिना ,दिल की तड़प कहता किसे।
  आंचल नहीं फिर भी छुवन, ही कम नहीं शिशु के लिये
     ममता वही तो है लुटा ,तीरथ यही जिसके लिये।

Friday, 31 August 2018

हरि गीतिका----क्रमांक 6

1  हरि गीतिका रट नीतिका,सोच समझ कर लिखा करें
  सुर ताल से मन मोहता,हरि के भजन लिख दुख  हरें।
        हम पांचवे को लघु रखें, हर सातवें में भी सखे
     मन में गुनें यह क्रम सदा,फिर अंत में गुरु ही रखे।

2   जब गोद मे मां के तभी, तक भा रहा यह जग जिसे
      वह तरसता तेरे बिना ,दिल की तड़प कहता किसे।
आंचल नहीं फिर भी छुवन, ही कम नहीं शिशु के लिये
         ममता वही तो है लुटा ,तीरथ यही जिसके लिये। 


3     सब पेड़ के कुल गुरु रहें, बर नीम पीपर हित करें
        आभार हम इनका करें,जग में सभी के दुख हरें।
     फल फूल दें सेवा करें ,सब कुछ लुटा कर चुप रहें
       उपकार भूलें हम सभी,नव पौध रोपण पथ गहें ।


4      यह रात तो बीते कहाँ , अब नींद भी आती नहीं
 भूले नहीं वो मधुर पल,अब भोर उजली लगती नहीं।
     तकलीफ में औलाद हो,अश्रु आँख के थमते नहीं
         मुश्किल घड़ी हों दूर सब,होते पास अपने नहीं।


5     धन संपदा जोड़ो नही, किस काम का तेरे लिये
        सब छूट जाता है यहीं  ,होता नहीँअपने लिये।
            करता रहा खिलवाड़ तू,मौज पाने के लिये
  कर लो जतन तुम भी जरा, प्रभु से मिलाने के लिये

Tuesday, 21 August 2018

हरि गीतिका क्रमांक 5

20/08, 20

1   मन रस भरे सब दुख हरे,देख शिशु मुख ममता जगे
     संताप हर सन्तान सुख,अमरत्व का अनुभव लगे ।
    सुत गोद उनके बैठ कर,मुदित मन हो जब नाचता
      ममता भरे मन में खुशी,उस पर सभी सुख वारता

2 : अवतरित हों इस देश की,पावन धरा पर अटल जी ।
  गुरु चाणक्य सुत शिवा भी ,साथ उनके हों भगत  जी।
           आजाद राणा जनम लें,वीरांगना अवतार लें
    फिर घातियों से निपटने ,कमर कस के सब ठान लें ।

3      मां भारती के लाल तुम,मन देश की परवाह हो
अंतिम समय में विवश तुम,अभी मिटने की चाह हो ।
     हर रोम में रमता वही,  वह रूह है क्यों दुख सहे
उम्र जो ढले थक कर पस्त,रख मन मलाल कष्ट सहे ।

4   है राह कांटों से भरे, कड़ियाँ बिखरती सांस की
   तम के घने इन बादलों ,में भी किरण है आस की।
 मन लोभ है कहते सभी, है दस्तक यह विकास की
मंजिल मिलेगी एक दिन,चिर कामना विश्वास की ।


5       करते सदा सम्मान हम,मां भारती केआन की
      हम तो खड़े इसके लिये, बाजी लगाने जान की ।
श्रम स्वेद अपना नित बहा,आगाज कर नव सृजन का
     मिल के सभी ऐसा करें,काया पलट हो वतन का ।