Saturday, 5 March 2022

2022 के स्वरचित संकलित गीत :-- यादों के कण, मेरे भाई



 

जल रही शमा भी रोशनी के लिए
ढल रही है रात रोशनी के लिए।

इक जुनून  मन में  वो लिए चले
शीश ये कुर्बान माँ भारती के लिए

इसी की कोख से जन्म हमने लिया
जिएं -मरें हम सभी देश के लिए

खड़े जहां वहीं से बढ़ें कदम कदम
कुछ तो करें देश के विकास के लिए

कौंधती दामिनी कह रही है  सदा 
चमक रहा  ये  रवि रोशनी के लिये 
डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर  ,छ ग

[02/09, 4:01 pm] Chandrawati 
भाई मेरे कबआओगे,मात-पिता की तुम्हीं निशानी
 करूँ प्रतिक्षा लेकर राखी,  खुश रखना सदा भवानी.
नेक  बड़े किस्मत से बेटे,घर  परिवार संभाले हैं 
स्वर्ग रहे मात पिता पत्नी, रिश्तों  की कदर न जानी.
 खुद  का   व्यवसाय तुम्हारा है, छुट्टी की ना मजबूरी 
 ना चाहूं कपड़े गहने पर, फिर भी होती क्यों  हैरानी. 
एक  कोख के हम जन्में  हैं,        माता-पिता के बड़े दुलारे 
बचपन में तो प्यार बहुत था, अब 
  आई क्या परशानी. 
 दिन में मेरे घर तुम्हें न भाया, रहे 
 संग ससुराल मेरे
 घर अपने रहना ना भाया,तेरी  शादी की ठानी.  
हर संकट में ढाल बनी मैं,  हाथ उठाकर सदा दिया है 
यम द्वारे से तुझको लाया,  क्यों  करता है नादानी.
 हम दोनों रहते दूर अकेले,  जरा  तो  सोच लो   भाई,
ना  झगड़ा है ना नाराजी, करते  बचपन से  मनमानी.
 ईश्वर का दिया है सब कुछ, पर 
 मिला  न  तेरा प्यार
 अकल मिले इतनी बस  इसको, 
 जीवन है बहता पानी.
 कहा सुना कुछ दिल में हो,  माफ करो  मेरे भाई
 अब तो ना रूठ मेरे भाई, चार दिनों की जिंदगानी.
 डॉ चंद्रावती नागेश्वर

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मुक्तक लोक का विशेष आयोजन 
"लो आ गयी महाशिवरात्रि"........

 नीलकंठ  बाघंबर धारी, ओम  नमः  शिवाय 
 गूंज  रहा धरती अंबर में,  ओम नमः शिवाय.  
 
शिव विवाह की पावन  तिथि में , शंखनाद गूंजे  
उमा का सिंगार  है अद्भुत ,  ओम नमः शिवाय.

 हे त्रिशूल धर जग हितकारी, शंभु  तुम्हें प्रणाम
 हे  शिव शंकर प्रलयंकारी, ओम नमः शिवाय.
 
 हे गंगाधर हे  त्रिपुरारी, गल नाग हार धर
 आशुतोष तुम अवढर दानी,ओम नमः शिवाय.

विपदा आन पड़ी है भारी, हे जगतारण शिव 
देवाधिदेव तुम महादेव, ओम नमः शिवाय.

 जग में तुम ही आदि अजन्मा, शरण गहें  तेरी
 दया करो भोले भंडारी, ओम नमः  शिवा
 डॉ चंद्रावती नागेश्वर
 सानफ्रांसिस्को 
 1 मार्च 2022
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भारत की गरिमा बढ़ती है, इसकी ही संतानों  से 
 खून पसीना खूब बहाते, डरें  नहीं बलिदानों से 

 देश किसी के  बने  नहीं है, खींची हुई रेखाओं से
 इसी  धरा पर हम  जन्मे हैं, भारत  के   दीवानों  से. 

 कर्ज चुकाते फर्ज निभाते, जान तिरंगे  में रहती 
 हरी भरी धरती की शोभा, खेतों और खलिहानों  से.
 रहें  प्रेम से बहु भाषा भाषी, रखते मन सद्भाव यहाँ 
 दया मूल है दान धर्म का. सीखा है विद्वानों  से. 


 नदी पहाड़ गाय भी पूजा,  बैल सर्प हाथी  पूजे 
 कृतज्ञता का ज्ञापन करना.सीखें हम गुणवानों से.

 देश  हमारा हमीं  देश से, इक दूजे से दोनों  हैं 
बुनियाद देश  की बनती  है , सैनिक  और  किसानों से . 

 लोक कथाओं लोक गीत में ,  जीवन सार समाया  है
 ॐ नाम चहुँ दिशि  बिखरे  हैं ,बन सुवास   बागानों  से. 
 खून बहा अनगिन  बेटों का, आजादी का सूर्य उगा
 संग समर्पण देशभक्ति के, रूप  दिया  अरमानों से.

 डॉ चंद्रावती नागेश्वर
 सानफ्रांसिस्को
09. 03. 2022
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वसंत  के दोहे :--
 तबियत  ढीली शीत की, रिपु सम लागे  मीत 
चहक  रही है धूप अब, पाकर सब की प्रीत. 

 शीत  विदाई ले रही, पीले पत्तों संग
 डाली डाली झूमती , लेकर  नई  उमंग. 
 
सुन आहट  ऋतुराज  की, बौराया  है  आम 
कलियों ने स्वागत किया, पूजित है अब काम

 पुष्प पालकी बैठकर, आया  है  मधुमास
  नृत्य करें हैं लोग  सब,   मौसम है अब खास.

 धरा सुंदरी ने  किया, फूलों से  सिंगार  
 जग आनंद विभोर है, देख बसंत बहार

 अपने पूरे रंग में , आता फागुन मास
 जीवन के सौंदर्य का, देता है आभास.  

पृथा कुमारी  से करे, फागुन प्यार अपार 
 फूलों की सौगात दे , करता है मनुहार.

डॉ  चंद्रावती नागेश्वर,
रायपुर,  छत्तीसगढ़
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हम यादों के कण-  चुन लेना, 
  याद  जरा हमको कर' लेना.

 सुधियों  के सूने कोने में, 
नन्हा सा दीप जला देना. 

 उत्सव  की कुछ  सौगातों में, 
बूंद  नेह  की  टपका देना. 

 पर्व  रोशनी  का जब आए,
भाव  पुष्प   एक  चढ़ा देना. 

 जो  भी  मेरे सखी  सखा  हों, 
    मीठी मुस्कान  हमें  देना.

भारत भू की मैं हूं रज कण, 
 गंगा जल  तर्पण कर देना.

 होली का पर्व मनाओ  तो,
चुटकी  भर रंग उड़ा देना. 

 हवा चले जब जब बसंत की, 
मन  की बगिया  महका देना . 

याद  आयें   दिवाली पर तो, 
हँस कर  इक दीप  जला लेना. 

डॉ चन्द्रावती नागेश्वर 
रायपुर   छत्तीसगढ़
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आ गई दीपावली, 
दे रहे शुभकामना 
द्वेष  की दीवार थी,
 मिट गई वह भावना. 

मन दीपक जब जलते
 तभी उजाले हंसते, 
   उतारो अहम  मन से
 अब दूरी न पालना. 

चैन  की हो जिंदगी
 सोचो फिर दोबारा,
 भंवर से पार आए
  अब हमें तुम थामना.

  सोच ले तो निभे  यह 
 जोड़ने का पर्व है
  
. चलो बदले स्वयं को 
  अब हमें ना हारना. 

 दिन वही रात वही 
सोच  बदली हैं अभी
चल पड़े नव राह  पर 
 मौसम है सुहावना.

डॉ चंद्रावती नागेश्वर 
रायपुर छत्तीसगढ़
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-याद   करूँ ना  बीता हुआ जमाना
 याद नहीं वो  छूटा   हुआ   मुहाना.  

 कभी नहीं वापस आता बीता कल
  भोर नया है गीत नया अब गाना. 

 आओ मिलकर पौधे नए  उगाएँ 
  हमें बाग फूलों के अब नये सजाना.
अपनी मुट्ठी में है आज हमारा 
हर हालत में हमको  इसे बचाना 

 नहीं भीड़ में गुम होना है मुझको
 अलग  पहचान भीड़ से मुझे  बनाना
 डॉ   चंद्रावती नागेश्वर 
रायपुर छत्तीसगढ़
 
संध्या रानी 

बड़ी लगन से  करे प्रतिक्षा,सूरज की पटरानी है 
कठिन सफर से लौटे प्रिय की, करती वह अगवानी है. 

  आभा चमके  जल थल नभ में,रूप  छटा बिखराती  वह 
साँझ ढले सबके मन मोहे, रवि प्रिया  संध्या रानी. 

 दिन डूबे करते हैं तारे, छुपा छुपी का खेल सभी 
 महके जूही चमेली द्वार,  प्रिय की थकन मिटानी  है. 

 चहक  चहक कर थके पखेरू, तुलसी पूजन  की बेला आई 
 देव आरती की तैयारी, घर घर  दीप जलानी है 

 रहें  अडिग सूर्य कर्म पथ पर,  निज  कर्तव्य निभाते हैं  
 जीवनसंगिनी संध्या को, राह वही अपनानी  है।
डॉ चंद्रावती नागेश्वर ,
रायपुर छत्तीसगढ़

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Friday, 25 February 2022

लघु कथा श्रृंखला---( 43 )सोनम के जज्बे को नमन . अनोखी माँ गणेशी,

" सोनम  के जज़्बे को नमन  है" 
           सन  2014 के  आम  चुनाव में   जब एक किन्नर ने  अमेठी  से  आम आदमी पार्टी की ओर से कांग्रेस पार्टी  के राहुल गांधी के खिलाफ  खड़ी  होकर  उसे चुनौती दी थी.तब वह पहली  बार अखबार की सुर्खियों में आई. 
यद्यपि  वह चुनाव नहीं जीत पाई पर उसके दमदार भाषण और तर्क संगत विचारों ने जनता को झकझोर कर  रख दिया था. उसके  पहले अठारह  साल की  उम्र में अजमेर की नगर निगम  की  काउंसलर रह  चुकी  है. 

         . उसके बादआमआदमी पार्टी  से  इस्तीफा  देकर  वह  मानवाधिकार आयोग की सदस्य 
बनी. कई समाज सेवी  संस्थाओं    से  जुड़  कर काम करने लगी. उससे प्रभावित होकर, समाज  
 वादी  पार्टी के अध्यक्ष ने नवंबर  2018 में सुलतान पुर से  चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया.  सोनम  किन्नर ने इस चुनाव में जीत का परचम लहराया. उसके  बाद  वह समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री बनी और दूसरी बार अखबार की सुर्खियों में छा गई. प्रेस कॉन्फ्रेंस में उसने इंटरव्यू देते हुए कहा कि -- राजनीति में आने का उसका एक विशेष उद्देश्य है. वह सैकड़ों वर्षो से समाज द्वारा उपेक्षित, प्रताड़ित किन्नर समुदाय  की  शिक्षा और आत्म सम्मान के लिए कुछ विशेष करना चाहती है. जो  भी पार्टी किन्नरों के कल्याण के लिए उन्हें  समाज में समानता का अधिकार दिलाने के लिए काम करेगी मैं उसके  साथ जी जान से काम करूंग़ी. 
 समाजवादी पार्टी ने उसे  गाड़ी. बंगला. गनर तो दिया, लेकिन किन्नर कल्याण बोर्ड की स्थापना  में जरा भी रुचि नहीं ली. इस बात से रुष्ट होकर उसने बाद में  समाजवादी पार्टी छोड़ दी.
        उसने  सुल्तानपुर मेंअपने बलबूते पर किन्नर आश्रम की स्थापना की, गरीबों जरूरतमंदों और सहायता की,उनकी शिक्षा स्वास्थ्य के लिए भी बढ़-चढ़कर काम किया.  कोरोना महामारी के समय, लॉकडाउन काल में जरूरतमंदों को निःशुल्क   भोजन उपलब्ध करवाया. स्वास्थ्य सेवा को सहज, सुलभ  बनाया. कोरोना के  दूसरे दौर में जब ऑक्सीजन की किल्लत बढ़ने लगी तब सुल्तानपुर में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने के लिए अपनी ओर से 5000/का चेक कलेक्टर को दिया.शीघ्र ही और पैसों की  व्यवस्था  का   आश्वासन भी दिया.  
: सुल्तानपुर में सोनम  किन्नर के रूप में नहीं वरन सम्माननीय नागरिक के रूप में जानी  और मानी जाती है. वह किन्नरों की शिक्षा स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान के लिए मरते दम तक संघर्षरत रहने के लिए कटिबद्ध  है. 
         भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने  उसे  उत्तर प्रदेश में राज्य मंत्री का दर्जा दिया है और किन्नर कल्याण बोर्ड की स्थापना कर उसका उपाध्यक्ष नियुक्त किया है. सोनल  जैसे  कुछ  किन्नरों के  अथक  प्रयासों  ने  यह  सिद्ध  कर दिखाया  है  कि व्यक्ति ठान ले तो  समाज की  दशा. और  दिशा  बदल  सकता  है. उन्ही  के  प्रयासों से  कुछ प्रतिभावान  किन्नर  युवा-- आई.  पी.  एस,  जज, और  आई. ए. एस. बनने  की  राह  पर  हैं 
 डॉ चंद्रावती नागेश्वर
  सानफ्रांसिस्को 
25.02.2022
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"अनोखी  माँ   गणेशी "

            आज गणेशी  का  चिर  संचित  सपना  पूरा हुआ.उसकी बेटी ललिता को  बिलासपुर के  त्रिवेणी भवन में होने वाले  महिला  दिवस  के राज्य स्तरीय कार्य क्रम  में आज विषेश  सम्मान मिलने  वाला है. उसे  एम. बी. बी.  एस.  परीक्षा की प्रावीण्य में सूची में पांचवां स्थान मिला  है. विशेष बात यह है, कि ललिता के साथ ही उसकी  मां  गणेशी पाटिल जो   उसकी एकल  अभिभावक  है, उनको  भी   "मातृ गौरव "सम्मान मुख्य मंत्री  के द्वारा किया जाएगा  . 
  कार्यक्रम में जब ललिता को मंच पर बुलाक़र सम्मानपत्र  पत्र दिया गया, तब ललिता ने अपनी मां को भी मंच पर बुलाने की अनुमति मांगी ललिता ने कहा कि.मेरी इस सफलता का श्रेय मेरी माँ  को  जाता है. उनके  कठिन संघर्ष,  प्रेरणा, और मेहनत से मैं आज इस मुकाम तक पहुंची हूं.  यह मैं  उन्हें  सौंपना  चाहती  हूँ.
  इसके बाद श्री गणेशी बाई पाटिल को  मातृ  गौरव सम्मान प्रदान किया गया. उन्होंने अपना परिचय देते हुए सभा में  उपस्थित सभी लोगों  को यह बताया --
        मैं श्री गणेशी बाई  एक सामान्य परिवार में अपने माता पिता की तीसरी  संतान पुत्र के रूप में पैदा हुई. गणेश चतुर्थी के दिन  दो बेटियों  के  बाद  मेरे जन्म से  परिवार में  खुशियों  श्री  गणेश  हुआ, मेरा नाम  श्री गणेश  रखा  गया .  लेकिन विघ्न,जिल्ल्त,नफरत मेरे जीवन का  हिस्सा  बन  गए. और  शुभ लाभ  मुझसे  सदा  दूर ही रहें.कदम कदम पर  उपेक्षा, नफरत, परेशानियां मेरी दोस्त बन गईं. माँ  की मृत्यु, सौतेली  माँ का  आना हुआ. किशोर उम्र तक आते-आते मुझ में असामान्य से परिवर्तन होने लगे 
मेरे माता-  पिता, साथी,रिश्तेदार  मेरा मजाक उड़ाने लगे.  
पिता ने मुझे घर से निकाल दिया. ट्रेन में एक किन्नर ने मुझे  पहचान लिया,अपने समुदाय में  शामिल  कर  लिया. मुझे किन्नर समाज के तौर तरीके सिखाए गए. मुझे पेट की भूख मिटाने के लिए नाचना, गाना, भीख मांगना पड़ा.  लेकिन यह सब  मेरे स्वाभिमान को आहत  करता था.मेरा एक गुरु भाई दक्षिण भारत के विख्यात ब्राह्मण परिवार से था. अब  हम  एक और एक मिलकर ग्यारह बन गए. दोनों ने मिलकर बीड़ी बनाने का काम शुरू किया.अब किन्नर समुदाय के लोग ही हमारा मजाक बनाने लगे. लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी. हमारे साथ कुछ और लोग शामिल हो गए. हमने किन्नर समुदाय के  उत्थान का बीड़ा उठाया. सेक्स वर्कर, एच . आई.   वी.  पीड़ितों   के  बच्चों  के कल्याण  के लिए  छोटी  छोटी  संस्थाएं बनाई और हमें जन सहयोग  भी  मिला. कटनी  की  प्रथम किन्नर महापौर से  आर्थिक सहायता और मार्गदर्शन भी मिला   
    इस  बीच एक दिन  डेढ़  महीने   की लाली कूढ़े  के ढेर में मिली.  उसे  मैंने अपने घऱ  ले आया.  उसे पालना एक चुनौती  भरा काम  था. छोटा  बच्चा सम्हालने  का कोई अनुभव  न होते हुए भी  मैंने  उसे  पालने  का निश्यच  किया. लाली  आधी रात को जब मेरे पेट पर अपना हाथ रख कर सोई तो मेरे मन में ममत्व का भाव जाग उठा. मेरे हृदय के अंदर एक मां ने जन्म लिया.  मुझ किन्नर को जो  दुनिया की नजरों में ना स्त्री ना  पुरुष था.  एक अपूर्ण मानव को उसने संपूर्णता से भर दिया.एक माँ  केवल तन  का ही नहीं  मन , बुद्धि, सोच,व्यवहार,  संस्कार संपूर्ण  व्यक्तित्व के सुसुप्त  बीज का  अंकुरण  करती  है.
   भारत  में  अर्द्ध  नारीश्वर   भगवान शिव की महिमा  गान और  भक्ति  करने वाले हमारा  खूब  अपमान  करते हैं. हमें  भी  तो  भगवान  ने  ही  बनाया है. ये  क्योँ  भूल  जाते हैं  ????  
 शिक्षा, संकल्प और प्यार से  महा परिवर्तन संभव है . मैं  शुक्रगुजार हूँ, उस  नन्हीं  सी बच्ची की,  जिसने मुझे स्त्रीत्व और मातृत्व से  भर  दिया. इस  इस समय मेरे पास 7 बच्चियां है जो समाज के द्वारा उपेक्षित, प्रताड़ित और  क्रूरता  की  शिकार  हुई हैं.  कोई 6 महीने की, कोई 12 महीने की, कोई 2 साल की, कोई 3 साल की मेरी गोदी में आई थी. आज कोई वकालत  कर रही है कोई टीचर, कोई  इंजीनियर कोई वकील  बनने की राह पर है.
       मैं  श्री  गणेशी अर्धनारीश्वर  रूप  में  
   आपके   सम्मान के  लिए  दिल से  आभारी  हूँ ..... 
डॉ चंद्रावती नागेश्वर
 दिनांक 15, 2, 2022

💐बोल अनमोल💐
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हृदय पटल पर हर्ष का रखना सुन्दर चित्र।
कैसा भी मौसम रहे खिलो पुष्प से मित्र।।
                          ~प्रो.विश्वम्भर शुक्ल

Thursday, 7 October 2021

लघुकथा श्रृंखला 42 --- " स्वागत उज्ज्वला का " बहादुर बेटी सरोज , "टीचर जी कीतीसरी सन्तान " ममता की तड़प,

 शीर्षक --"-स्वागत  उज्ज्वला का" (समानता की नई पहल)
        आज अंजना जी अपने पति  अमित अग्रवाल जी के साथ बुलन्द शहर से महाराष्ट्र के पुणे शहर के लिए रवाना हुई हैं । पति तो ऊपर  जाकर सो गए। अंजना की आंखों में दूर दूर तक नींद नहीं है । उनका गुजरा हुआ कल उनके सामने आ कर खड़ा हो गया । शादी के नौ साल हो गए ।आज भी उनकी गोद सूनी है । परिवार वालों और रिश्तेदारों के ताने सुन सुन कर हताश  हो गई थी। डॉक्टरी जांच से पता चला कि  --- वे माँ नहीँ बन सकती । पति दूसरी शादी के लिए तैयार नहीं हैं । किसी ने कहा  बच्चा गोद ले लो ।  किसी ने कहा  सेरोगेट मदर की सहायता ले लो । 
पर वे नहीँ मानें ।
    अमित जी ने कहा --  मुझे शादी के सात वचन अच्छी तरह याद हैं । विवाह के  हर सालगिरह के दिन हम दोनों उसे दोहराते हैं।
  हम एक दूसरे  के पूरक हैं । कुछ न कुछ कमी हर इंसान में होती है । हमे उन कमियों और खूबियों के साथ निभना है।
 शायद ईश्वर हमे सन्तान न देकर कुछ और अच्छा काम कराना चाहता है । उन्होंने अंजना से कहा --  हम ऐसा बच्चा गोद लेंगे,  जिसे समाज नहीँ स्वीकारता ।  लोग कुत्ते ,बिल्ली, खरगोश,कछुवा , बन्दर ,यहाँ तक कि सांप भी पालते हैं ।
 हम किन्नर बच्चा गोद लेंगे । उन्होंने गूगल सर्च में डाल रखा था ।अब जाकर उनकी प्रतीक्षा पूरी हुई है ।
 आज वो दिन आ गया है, कि हम ऐसी ही 4 माह की एक   को गोद लेने जा रहे हैं।  जिसे कोई अपनाने को तैयार नहीं है ।यहाँ तक ,कि सरकारी अनाथ आश्रम ने भी अपने यहाँ रखने से इनकार कर दिया है ।
             इस नवरात्रि में हमारे लिए इससे बड़ा उपहार क्या हो सकता  है?
उन्होंने  किन्नरों की ,लांछित ,प्रताड़ित ,उपेक्षित जिंदगी को बहुत करीब से देखा है। उनकी पीड़ा को पहचाना है। उनका एक मित्र किन्नर है । अमित जी भिलाई में मामा के घर मे रहकर  पढ़ाई करते थे। ट्रेन से रोज भिलाई से रायपुर कालेज पढ़ने जाया करते थे , तभी  उससे पहचान हुई । जो  दोस्ती में बदल गयी । उन्होंने  उसकी पढ़ाई में आर्थिक सहायता की  । बैंक से लोन दिलवाया । आज वो बड़े  दुकानदार हैं ।
               बुलन्दशहर में अमित जी के चचेरे भाई रहते हैं।
  वहां उनकी पुश्तैनी जमीन है।वो दोंनो मिलकर बुलन्दशहर में किन्नरों के लिए एक  धर्मशाला बनवाया है। जो भारत का इस तरह का पहला धर्म शाला है । पहले समाज से  चोरी छुपे मित्र  से मिलते ,उसकी सहायता  करते । अब बेटी को गोद लेने का फैसला करके,  बिना किसी हिचक के  इस काम को करने का बीड़ा उठाया है । अब तो इस काम में उनकी पत्नी भी समर्पित है ।
         अंजना जी ने  चेतना किन्नर कल्याण समिति बनाई है जिसमे उनकी तरह समर्पित भाव से काम करने वाली  सात महिलाएं और हैं। वे सातों   बच्ची के स्वागत में स्टेशन पर आने वाली हैं।  गोद पुत्री के  नामकरण संस्कार  पर बहुत बड़े जश्न का आयोजन  होने वाला है  । सबने मिलकर सोचा है कि  उसका नाम उज्ज्वला रखा  जायेगा ।  इसके बाद किन्नरों के लिए एक आवासीय स्कूल का भी  शिलान्यास  किया जाएगा।
डॉ चंद्रावती नागेश्वर 
 रायपुर   छ  .ग.
 6  '10  20 21
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 शीर्षक ---" बहादुर बेटी सरोज "
बस्तर के बीहड़ जंगल मे इंद्रावती नदी के किनारे बसे गांव सेन्द्रीपाली में परिवार के साथ रहती है।
मिट्टी का कच्चा घर है खेती किसानी करके दो जून का जुगाड़ हो जाता था। एक दिन कुछ नक्सली आये  और पिता को बाहर बुलाकर बात किया । पिता के इनकार करने पर पिता ,मां ,बड़े भाई सब को गोली से मार डाला।
उस दिन सरोज अपने मामा के घर गई हुई थी। उसकेबाद से वह अपने घर कभी नहीं लौटी ,आज दस साल बाद  पढ़ लिख कर नौकरी जॉइन करने पुलिस बनकर थाने में आई है।
   थाने दार एवम अन्य पुलिस कर्मियों ने बड़ी गर्म जोशी
से उसका स्वागत किया।
जब पुलिस विभाग में उसकी पोस्टिंग हुई तो कोंटा जिला मुख्यालय में पूछा गया - कि महिला है -नई नौकरी है-नई उमर की है । कुछ दिन  यहीं  अटेच कर देते हैं  । 
सरोज ने बड़ी विनम्रता से कहा -  मैं सेन्द्रीपाली एरिया में जाना चाहती हूं  । थानेदार ने ध्यान से उसे देखा ।फिर कहा - उस बीहड़ जंगल के नक्सली इलाके में पग पग पर
मौत का खतरा मंडराता रहता है ।
सरोज ने कहा -- मौत तो एक दिन आनी ही है सर,  मैं किसी मकसद से पुलिस विभाग में आई हूँ । मेरी मौत तो आज से दस साल पहले हो गई होती । ईश्वर ने मुझे मेरे माता , पिता भाई के कातिलों से बदला लेने ही जिन्दा रखा है। 
मैं खतरों से नहीं डरती  । बहादुरी  से उनका सामना करते हुए अपने लक्ष्य को पाना चाहती हूँ । 
  खुश होकर थानेदार ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा ---  सच कहती हो सरोज "   बहादुरी "  सिर्फ पुरुषों की
जागीर नहीं है  यह तो एक जज्बा है ,जुनून है।
ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे ,कामयाबी दे  ।

  डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर ,छ ग
9 , 10 ,2021

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शीर्षक  ---  "तीसरी सन्तान"

                रमेश के पिता मोहित विश्वास  भोपाल के केंद्रीय विद्यालय में  T.G .T. हैं ।  आजकल वे अपने बेटे के कारण बहुत परेशान रहते हैं। रमेश  अभी नवमी ही पास किया है । रमेश शुरू से शान्त स्वभाव का, लेकिन पढ़ने में होशियार है । पर अब कुछ दिनों से स्कूल नहीं जाना चाहता, पढ़ने लिखने में उसका मन नहीं लगता। एक टीचर के लिए यह बड़े अफसोस की बात है। कि उसका खुद का बेटा पढ़ना
ही नहीं चाहता ।     
 वह स्कूल पिता के साथ ही जाता।पर असेम्बली के बाद  मौका  देख कर  स्कूल से गायब हो जाता । अकेला ही मन्दिर में,गार्डन में,नदी के किनारे, घण्टों बैठा रहता। मार पीट कर, सजा  देकर ,समझा कर देख लिया  कोई सुधार नही हुआ। 
उसे साइकोलॉजिस्ट को दिखाया गया, डॉक्टर ने परिवार की हिस्ट्री पूछी तो उन्होंने बताया -लक्ष्मी और ललिता  नाम की दो बेटियों के सात साल बाद बहुत मन्नतों के बाद उनके यहाँ  पुत्र जन्मा है। उनके दादा के नाम पर रमेश नाम रखा गया।उसे सबसे ज्यादा लाड़ दुलार मिलता है।
          जब डॉक्टर ने उससे अकेले  में कई बार बात किया। तो उसने बताया ,कि मेरे साथियों की दाढ़ी मूछ निकलने लगी है ।पर मुझमे इस तरह का कोई बदलाव नहीं आया। सब मुझे चिकनू  कहकर चिढ़ाते हैं । मेरे सीने में उभार आने लगा है । मेरे साथी मेरा मजाक बनाते हैं। डॉक्टर ने कहा कि --  वास्तव में रमेश लड़का नहीं लड़की है ।इस उम्र में हार्मोनल चेंज आते हैं ।ये चेंज स्पष्ट संकेत दे रहे हैं । इसे दिल्ली  एम्स हॉस्पिटल में दिखाना होगा। मोहित को सरकार की ओर से फ्री मेडिकल सुविधा मिलती है । दिल्ली में  सारी जांच हुई वहां पता चला ,कि वह  किन्नर है।उसके शरीर में मेल हार्मोन नहीं बन रहे हैं ।फिमेल हार्मोन ही विकसित हो रहे हैं। तमिल नाडु में सेक्स चेंज ऑपरेशन करवाना पड़ेगा। अविकसित बाह्य अंग को  हटा दिया जाएगा। ऑपरेशन के बाद वह सामान्य जिंदगी जीने लगेगा । मोहित सर ने अपना ट्रांसफर तमिलनाडु  में करवा लिया।     
    आपरेशन के बाद  रमेश रमा बन गई ।  रमा अपने इस नए रूप में बहुत खुश है।।डॉक्टरों ने बताया कि रमा की शादी हो सकती है ।वह सहज रूप से अपना दाम्पत्य जीवन जी सकती है। पर सन्तान को जन्म नहीं दे सकेगी।संसार में ऐसे कितने ही दम्पत्ति हैं जिनके सन्तान नहीं  हो पाते । रमा भी किसी अनाथ बच्चे को गोद ले सकती है । कोर्ट में  डॉक्टरी प्रमाण पत्र  देकर नाम परिवर्तन कराया गया ।
            तीन साल के अन्तराल के बाद रमा ने फिर से पढ़ाई शुरू की ।  होम ट्यूशन और कड़ी मेहनत के बाद बारहवीं बोर्ड की परीक्षा 75℅ अंको से पास किया। चेन्नई के ब्रिलिएंट कोचिंग सेंटर  मे P M Tकी तैयारी किया। पी .एम .टी  . में चयनित हुआ। कुछ दिनों बाद चेन्नई मेडिकल कालेज में उसका  एडमिशन होने वाला है । पांच साल बाद पढ़ाई से कतराने वाला वही बच्चा  डॉ रमा विश्वास बनकर किन्नरों के पुनर्वास हेतु काम करने के लिए कटिबद्ध है।
                      मोहित सर का पूरा परिवार उन दिनों  बड़े मानसिक तनाव को झेला। बड़े धैर्य और समझदारी से आसन्न परिस्थितियों का  सामना किया। आज उन्हें इस बात का गर्व है ,कि उनकी तीसरी  सन्तान  डॉक्टर बनने की राह पर चल पड़ी है। उसमें प्रतिभा,क्षमता  ,और इच्छा शक्ति की कोई कमी नहीं है । वे तो यह सोचकर खुश हैं, कि उनकी रमा समाज सेवा के क्षेत्र में नया आयाम गढ़ने वाली है ।
 डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर   छ ग
दिनांक 14  ,10  ,2021

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शीर्षक --"तड़प नवजात के लिए " /ममता की तड़प

          आज कंचन के  नवजात पुत्र को गुजरे 10दिन हुआ है। आज नव प्रसूता को हास्पिटल से छुट्टी मिली है। वह किसी से बोलती भी नहीं ।खाना पीना सब त्याग दिया है।  दुखी मन से खिड़की के पास बैठी रहती  है ।   उसकी आँखों मे होलिका दहन की       धधकती ऊंची ऊंची लपटें  दिखाई देती हैं। उसके मनके अंदर भी इसी तरह की शोकाग्नि की लपटें उठती रहती है । आँखों से अविरल अश्रु प्रवाहित होते रहते हैं। अपने किस्मत को कोसती रहती थी। पति ने एक दिन की भी छुट्टी लेकर उसे ढ़ाढ़स नहीं बंधाया।
 उसके पति प्रकाश कालेज में पढ़ते थे तब किसी लड़की को पसन्द करते थे।  शादी  करना चाहते थे। किंतु प्रेमिका की शादी कहीं और हो गई। इसके तीन साल बाद कंचन से प्रकाश की शादी हो गई।  कंचन का सांसारिक जीवन   सामान्य किंतु  भावशून्य ही रहा।  ससुराल वाले समझाते हैं,धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा।
बच्चा कोख में आया तब से कंचन के मन में उम्मीद जागी कि उसे नहीं  तो अपने बच्चे को चाहेँगे। बच्चा दोनो को
जोड़ने की  कड़ी बनेगा।
          होली के दिन ही उसकी पहली संतान आलोक का जन्म हुआ ।पूरा हास्पिटल उसके रुदन की आवाज से गूंज उठा  था ।कस्बे का कुल40 बेड का प्राइवेट अस्पताल था 
कंचन की  हालत  ठीक नही थी ।वह दर्द से छटपटाती रही । ऑपरेशन के लिए ब्लड की जरूरत थी। पर वह अकेली है ।उसके पति तो हास्पिटल में भर्ती करके नाइट ड्यूटी पर चले गए ।तब फोन और मोबाइल का जमाना नहीं था । 
   रात में लाभग ड़ेढ़ बजे मरणांतक पीड़ा झेल कर बेटे को जन्म दिया । उसके बाद उसकी आंखे बंद होने लगी। वह अचेत हो गई । कुछ भी याद नहीं रहा।  सुबह 4 बजे उसकी मूर्च्छा टूटी । दोनो हाथ टेप से चिपके हुए थे बाटल लगा हुआ था । थोड़ी दूर पर नवजात बच्चे  के कार्ट में से लगातार रोने की आवाज उसे बेचैन कर रही थी। उसका मन कर रहा था ,कि बच्चे को उठा कर सीने से लगा ले पर वह करवट भी नहीं ले सकी।उसने शक्ति भर जोर लगा कर  आवाज लगाई सि..स्टर...सि...स्टर....
 दरवाजे पर ऊंघती सफाई कर्मी नर्स को बुला लाई । उसे स्टेचर पर दूसरे रूम में शिफ्ट किया गया । कंचन ने 
कहा ---सिस्टर मेरा बच्चा मुझे दे दो ---
 सिस्टर---अभी  नहीं । तुम्हारे पति के
आने के बाद।
           कंचन बडी बेसब्री से पति का इंतजार करने लगी ।उसे लग रहा था ,कि दीवार घड़ी का कांटा  जल्दी क्यों नहीं बढ़ रहा है। शाम को उसके पति आये साथ मे पास पड़ोस की5- 6 लेडिस भी मूक खड़ी हो गई । 
कंचन नेपति से पूछा -- हमारा बच्चा कहाँ है??? मेरे पास लाते क्यों नहीं???
मैं अभी आया कहकर पति बाहर निकल गए ।
 मोहल्ले वालों से पता चला कि --- उसका बच्चा सुबह 6बजे दम तोड़ चुका है। मुझे मेरा बच्चा चाहिए ..... 
चाहे मरा हुआ हो या जिंदा .....
एक बार तो उसे गोद मे लेने दो ....
सीने से लगाने दो ....  नौ महीने तक मैंने हर पल  अपनी हर धड़कन के साथ उसके हर  स्पंदन को महसूस किया है ।उसके जन्म के बाद मुझे मौत क्यों नहीं आई । अब मैं जी कर क्या करूंगी ??
  कभी वह ट्रक के सामने जाने की कोशिश करती।कभी उसे लगता कि घर के पास वाले तालाब में जाकर जान दे दे । 
  उसका पति ही उसे मरने के लिए हॉस्पिटल में छोड़ कर  चला गया । कैसा हृदयहीन  पिता है ,जिसे अपने रोते हुए नवजात बच्चे को गोद मे लेकर की चुप कराने की चाहत नहीं जागी। हॉस्पिटल के अनजान,बेगाने लोगों के बीच प्रसव पीड़ा से तड़पती पत्नी को छोड़ कर चला गया ।
 ऐसा बेदर्द औऱ  लापरवाह आदमी भी हो सकता है ।सामान्य इंसान के बारे में यह कल्पना नहीं की जा सकती। सकती। कंचन को  उसके  मायके वाले आकर ले गए । बड़ी मुश्किल से उसे सम्हाला।  वह  अपने पति के पास वापस आने को किसी भी तरह राजी नहीं हुई । पति नाम के रिश्ते से उसे नफरत हो गई । उसे लगता कि उसका बच्चा बदल दिया गया । पति वहाँ होता तो  उसका बच्चा नहीं मरता ।और यदि मान लो मरता भी तो पिता की बाहों में दम तोडता, उसे मृत बच्चे को क्यों नहीं दिखाया गया ??
  उस रात केवल कंचन की ही डिलेवरी हुई थी। हॉस्पिटल 
का रिकॉर्ड  में यही दिखाया गया।  जीवित मेल चाईल्ड 22 मार्च सन 1979 नार्मल डिलेवरी 5पौंड  कंचन सहाय पति।प्रकाश सहाय उम्र 26 वर्ष .......
डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर छ ग
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Tuesday, 14 September 2021

कुछ चयनित नए छंद ---

एक है भाषा मेरे देश की ,नाम है उसका हिंदी 
माथे पर सज  कर बन जाये, वो आनन की बिंदी।

 कण्ठ वासिनी भाव दर्शिनी,
मुख से मुख की पथिका।
 विचार वीथिका की प्रवासिनी,
अतुल निधि की मलिका ।
बावन अक्षर  सेवक इसके , 
सोलह स्वर की कलिका ।

ऐसी भाषा  मेरे देश की, नाम है जिसका हिंदी
माथे पर सज  कर बन जाये, वो आनन की बिंदी।
 रूप सलोना लगता उसका, 
घर घर की वह  गृहिणी
बंगाली उड़िया गुजराती,
पंजाबी बहु वर्णी ।
तमिल तेलगु कन्नड़ अवधी।
इसकी सखी सहेली

मोहक भाषा मेरे देश की
   नाम है उसका हिंदी
माथे पर सज  कर बन जाये, 
वो आनन की बिंदी।

मन आंगन में महके खुशबू 
 ये बहुजन की भाषा ।
स्वाभिमान की शान बढ़ाये,
 सुख दुख की परिभाषा।
सहज सरल और' सुघड़ सलोनी
 जन मन की अभिलाषा।

मीठी भाषा मेरे देश' की ,
 नाम है उसका हिंदी।
माथे पर सज कर बन जाये, 
वो आनन की बिंदी।
डॉ चन्द्रावती नागेश्वर 
रायपुर छ  ग
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सभी साहित्य प्रेमी आत्मीय जनों को रंगोत्सव की  सतरंगी बधाइयाँ,नेह चाशनी में पगे  शुभकामनाओं के साथ  प्रस्तुत है ........
  इस होली पर देखिए ,     कोरोना की मार  सूना सूना सा लगे   ,    मस्ती का  त्यौहार। 

  दूर  दूर सब ही रहें , गाल हुए ना लाल 
 रंग  लाल पीले हुए ,  दुख में भरा गुलाल।

 है मौसम मधु मास का,  खिलें न फूल पलास
 कोरोना को देख कर ,   जंगल हुआ उदास।

होली फिर भी आ गई  ,रंग  हुये   बेताब
  सभी लगाते रंग हैं  , मुख पर  ढंके नकाब।

फागुन के दिन चार हैं , खुशियां आईं द्वार
प्रीत रंग में डूब के ,    खुद पर  कर उप कार।

          डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
              रायपुर  छ ग
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जन्माष्टमी
जन्म दिवस गोपाल का,   लेकर आया भोर
अंतस में छवि श्याम की , मन आनंद विभोर।

भादों की है अष्टमी ,     खुशियों की बरसात
देख उजाला जो हुआ ,       पंछी करते शोर।

चरण  पखारे   कालिंदी ,  बाल  कृष्ण मुसकाय
पूनम के हैं चाँद प्रभु    ,      यमुना उठे हिलोर।

हर रिश्ते में रस भरें। ,      मुख मण्डल में तेज
जिधर पड़ें उनके कदम ,  होवे वहीं   अँजोर ।

करें शरारत खूब  वो,     हैं नटखट नंदलाल
मोहक छवि है कृष्ण की, देखें  सब उस ओर।

लीला धर तो  श्याम हैं ,  महिमा बड़ी अपार
शैशव में लीला करें  ,बन कर माखन चोर । 

भुवन मोहिनी रूप ले  , जग  को लिए लुभाय
  वश में  जिनके विश्व  है,  राधा चन्द चकोर।

तीन लोक के नाथ जो ,  जग  के पालनहार
गोप ग्वाल के प्रिय सखा, ब्रज के नंद किशोर।

डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
 रायपुर छग
कृष्ण जन्माष्टमी  गीतिका
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प्रणाम भोर का ~
👏
(छ्न्द तमाल - 16+3,चौपाई +गाल)
दिवस ढले ,आ जाय घनेरी रात,
दे देना प्रभु एक समुज्ज्वल प्रात।
-
दुर्गम पथ पर हैं अनेक अवरोध,
पाहन,पर्वत,बीहड़, प्रबल प्रपात।
-
रोक रहे उत्कर्ष विपुल अपकर्ष,
पल-पल,प्रति पग कर जाते हैं घात।
-
हों कृपालु परमेश्वर देना छाँव,
अनाहूत यदि हो जाये बरसात।
-
शरण आपकी पाना ही है ध्येय,
चलते -चलते थक जाये जब गात।
         -------   विश्वम्भर शुक्ल 
^
(छ्न्द तमाल - 16+3)
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Sunday, 12 September 2021

लघुकथा श्रृंखला 41--- नया अध्याय ,बुढ़ापे का सहारा ,जिम्मेदारी अपनी अपनी,प्रायश्चित की चाह

 शीर्षक-- नया अध्याय
   नागपुर स्टेशन में ट्रैन की टिकिट लेकर रेलवे ब्रिज के ऊपर  से प्लेट फॉर्म न.2 की ओर जा रही थी । अचानक पीछे से किसी ने उसे पुकारा --  रंजना दीदी रुकिए ....
    उसने पूछा - कौन हो तुम ?? 
 उत्तर मिला -- मैं मीना गुरुंग बलौदा  ...  बोलते हुए चेहरे सेे चुन्नी हटा लिया । 
रंजना ने कहा -- ट्रेन आ चुकी है ,तुम किसी भी डिब्बे में चढ़ जाओ अमरावती  में मेन गेट के बाहर मिलना ।
       इतना कहते हुए रंजना तेजी से आगे बढ़ गयी ।नागपुर से अमरावती की वह लोकल ट्रेन है,2घण्टे में पहुँच जायेगी ।रंजना के पति रेलवे में गार्ड हैं। अमरावती में ससुराल पूरा परिवार है ।जहां हप्ता -पंद्रह दिन में जाती रहती है ।
        रंजना रास्ते भर मीना के बारे में सोचती रही । मीना बलौदा में उनके घर के पीछे में रहती थी । उसके पिता बैंक में गार्ड का काम करते थे  4 बहनें ,दो भाई का बड़ा परिवार था।  मीना की माँ हमारे घर बर्तन पोछा का काम करती । मीना दसवीं में पढ़ती  अपनी माँ के साथ सहायता के लिए आ जाती। कभी पढ़ाई की समस्या लेकर आती  ।उसका ज्यादातर समय हमारे घर मे बीतता था ।  बारहवीं के बाद वह नर्सिंग ट्रेनिग करने चली गई। उसके पहले मेरी शादी हो गई  मैं नागपुर आ गई ।  आज इतने साल बाद मीना को इतनी बुरी हालत में  यहां देखा  है । तो उसे बड़ा दुख हुआ ।
                  अमरावती गेट के पास मीना उसे मिल गई ।उसे पहले वहीं केंटीन में नाश्ता करवाया ।  फिर पूछा ---कैसी हालत बना रखी है अपनी ?  
 मीना रोने लगी, बोली --- सब किस्मत का खेल है  दीदी।  
रंजना -- मैंने सुना था तुम नर्स बन गई हो ।
 मीना -   ट्रेनिंग कर रही थी।आप तो जानते  हैं ।हम बहुत गरीब  हैं । मेरी फीस के पैसे  के लिये एक रिश्तेदार ने सहायता की थी । उसी के बेरोजगार बेटे से मेरी ट्रेनिंग पूरी होने के पहले ही माँ पर दबाव डाल कर मेरी शादी करा दी 
मेरा पति  नपुंसक था । ससुराल  वाले पैसा देना बंद कर दिए।  मैं फाइनल एग्जाम नही दे पाई । मुझसे हर दिन  मार पीट करते ।  मुझसे कहते   ---- तेरी पढ़ाई में इतना पैसा लगाए हैं,ब्याज सहित सब  वसूल करेंगे। मेरे सास ससुर  मेरी देह का सौदा करने  के लिए विवश करने लगे । कहते शादी के बाद यही सब तो पति करता है ।इसमें   गलत क्या है ?  तू तो हमारे  लिए काम की न काज की पसेरी भर अनाज की ।तेरे खाने रहने का पैसा कहाँ से आएगा ?  वो लोग मेरा जीवन नर्क बनाने  में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते थे । 
               एक दिन मौका देख कर मैं भाग निकली। और छिपते छिपाते इतवारी पहुंच गई । घर के बाहर की दुनियां ओरतों के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं  है । जान बूझकर मैं सफाई से नहीं रहती । भिखारिन की तरह रहती हूं ,ताकि इज्जत बची रहे । स्टेशन से कुछ दूर गुरुद्वारे के लंगर में खाना खाती हूँ । दिन भर  बर्तन साफ सफाई कर देती हूं ।जंहा जगह मिले सो जाती हूँ।
        रंजना ने अपने बैग से उसे एक जोड़ी कपड़े और कुछ पैसे दिए और अपना एड्रेस देते हुए  बोली --- साबुन खरीद कर नहा कर साफ सुथरी होकर चार बजे तक ऑटो से यहां आ जाना।
 आज से तेरी जिंदगी का नया अध्याय शुरू होगा ।
               रंजना के ससुर  रिटायरमेंट के बाद छोटे बच्चों का नर्सरी स्कूल चलाते हैं । उनसे मीना के बारे में बताया ।  उसे प्यून की नौकरी देने की सिफारिश की । वह बड़ी ईमानदारी और समर्पित  भाव से काम करती । घर मे सासू माँ  की सहायता करती। कुछ महीने बाद उसी स्कूल के चोकीदार से
उसकी शादी हो गई ।चौकीदार की पत्नी एक्सीडेंट में पिछले साल खतम  हो गई थी ,उसकी  दो साल की एक बच्ची है।
  डॉ चंद्रावती नागेश्वर
 रायपुर   छ ग 
 दिनांक 12 ,09 ,2021
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" शीर्षक"  -बुढ़ापे का सहारा
       कल्पना --  हलो कामिनी --  सुनो  सुशील का एक्सीडेंट हो गया है । उन्हें   सेक्टर 9 हास्पिटल में  ले जा रहे हैं... 
 कामिनी पति के साथ आधे घण्टे में  हॉस्पिटल पँहुची । कल्पना ने बताया --  कोई नौसिखिया कार चालक  मोड़ पर सुशील की स्कूटर को टक्कर मार कर  फरार हो गया। सुशील छै माह तक हॉस्पिटल में रहा, उन्हें दिल्ली,वेलूर भी रेफर किया गया।हर जगह कामिनी के पति गिरधर जी भी साथ गए। कामिनी ने  घर पर उनकी बेटियों को सम्हाला।  कामिनी  बोली - दीदी इन बेटियों की बिल्कुल चिंता मत करना पहले मेरी एक बेटी थी अब दो हो गईं।
 कामिनी का एक ही बेटा है, तुषार जो भोपाल  में B. E . कर रहा है। उसके  जाने के बाद कामिनी बहुत रोती रहती थी । तो तान्या को घर में ले जा कर रख लेती। कल्पना और  कामिनी चचेरी बहन हैं ।दोनो साथ पढ़ी हैं । दोनो की 
  आपस में खूब बनती है ,तो सहेली भी हैं । 
       सुशील के रीढ़ की हड्डी में ऐसी चोट  आई, कि लंबे इलाज के बाद भी पूरी तरह ठीक न हो पाए । उनके कमर से  नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया। व्हील चेयर पर घर लौटे । 
       घर की आर्थिक व्यवस्था  चरमरा गई । उनके इलाज में कल्पना के गहने बिक गए।सुशील की नौकरी छूट गई। भिलाई में प्राइवेट ठेकेदार के पास  सुशील काम करते थे। किश्तों में दो कमरों का घर खरीद लिया था ,तो सिर पर छत बनी रही।कल्पना की  बड़ी बेटी तान्या दसवीं में, छोटी सौम्या आठवी में है।तान्या बचपन से कामिनी की लाडली है।बेटे के भोपाल चले जाने से घर सूना हो गया। तब से तान्या को गोद लेना चाहते हैं । अब दोनो परिवारों की आपसी सहमति से कानून वह उनकी बेटी बन गई । इस दुर्घटना के बाद तो उन्हें एक नहीं दो  बेटियां मिल गईं । 
          तुषार भैया पढ़ाई के कारण होली -दिवाली पर ही घर आते थे । B. E. के बाद M .B.A.  फिर नौकरी मिली तो मुम्बई चले गए । वहां से जर्मनी  के लिए चयनित हुए।वहां अपनी कलिग से शादी कर लिए।      
       तान्या भिलाई में ही रह कर बी कॉम करके C. A . की तैयारी करने की ओर अग्रसर है ।
          कल्पना ने  पति की देखभाल करते हुए,  टिफिन बनाने का काम शुरू किया । सौम्या बी .एस .सी. के बाद  गिरधर जी के बिजनेस में हाथ  
  बंटाने लगी। उनका बिल्डिंग मटेरियल का बिजनेस है।उनकी तबीयत अब ठीक नहीं रहती । हार्ट पेशेंट हैं।बेटे को बार बार वापस बुलाने की मिन्नतें करते।पर वह भारत आकर   रहना नहीं चाहता।
तुषार पहले तो दो -तीन साल में  माँ पापा से मिलने आ जाता ।अब आना तो दूर  उनसे बात भी नहीं हो पाती । कल्पना कहती -  ठीक है बेटा तेरी खुशी में अब हमारी खुशी है । भगवान को लाख लाख धन्यवाद कि समय रहते हमे सद्बबुद्धि दी और हमने बेटी गोद ले लिया । हमें बुढापे का सहारा मिल गया ।

डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर   छ ग
दिनांक 15,  9 ,2021

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शीर्षक "जिम्मेदारी अपनी अपनी "
       आज वसुधा बहुत उदास बैठी है। शाम के सात बजे गए  हैं  न दिया बत्ती की, न लाईट जलाई । उसकी पड़ोसन  विमला ने  पास जाकर पूछा -- क्या हुआ ??? कमरे की लाईट भी नहीं जलाई। भाई साहब की तबियत ज्यादा बिगड़ गई क्या ?  
आंसू पोछते हुये वसुधा बोली --  क्या कहूँ बहन? नीरज       आज  शाम को ही बंगलोर चला गया ... 
 ये हॉस्पिटल में हैं। इन्हें हार्टअटैक आया है,अब खतरे  से बाहर हैं।हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो जाते तब जाता।इन्हें छोड़ कर चला गया। बोला  --  अब हालात पहले से बेहतर है । हॉस्पिटल में  अच्छे डॉक्टरों से इलाज हो रहा  है । माँ मुझे जाना होगा।मेरे लिए ये गोल्डन चांस है ।मेरे भविष्य का सवाल है। मैं नहीं रुक सकता। सोनल है न यहां सब कुछ सम्हाल लिया है उसने । तभी तो मैं निश्चिंत होकर जा रहा हूँ।
               मैं यू . एस .जाकर वहाँ अच्छे से अच्छे इलाज की व्यवस्था करवाऊंगा।आप चिंता क्यों करती हो ? पापा जल्दी ठीक हो जाएंगे ।बस थोड़े दिनों की बात है ।
   बारहवीं के बाद से नीरज B E, M.B.A फिर नौकरी के चलते 7 साल से बाहर ही है।अब तो परदेश जा रहा है ।अभी तक तो होली ,दिवाली,राखी  में घर आ जाता था ।   
 विमला - तुम्हारी सोनल तो बेटे से कम नहीं है । घर -बाहर के सब काम के साथ पढ़ाई में भी तो बहुत तेज है। इस साल  कालेज के फाइनल है न ?
  वसुधा --हां बहन सोनल ने रेस्टोरेंट का काम भी सम्हाल लिया है।अब  उसकी परीक्षाएं पास आ रही हैं पढ़ने के लिए जरा भी समय नहीं मिलता उसे। 
  सप्ताह भर बाद पति घर गए।डॉक्टर  ने  रेस्ट के लिए बोला है ।नीरज को फोन पर बताया - ओपन हार्ट सर्जरी करवानी पड़ेगी । तू वापस आ जा बेटा।छुट्टी नहीं मिलती तो नौकरी छोड़ के आजा ।  प....र....
 सोनल बोली- भैया ने तो मना कर दिया ... कहता है 3 साल का बॉण्ड है।नौकरी नहीं छोड़ सकता। नई नौकरी है तो7 दिन से ज्यादा छुट्टी नहीं मिल सकती । क्या करें ? समझ मे नही आता ।
     वसुधा ने अपने भाई को बुलवाया  मकान और रेस्टोरेंट गिरवी रख, वेलूर ले जा कर पति का इलाज करवाया । सोनल की परीक्षा की तैयारी नहीं हो पाई, ड्राप ले लिया।
        साल भर के बाद नीरज वापस भारत आया साथ में  अपने माता पिता के लिए अमेरिकन बीबी तोहफे में लाया ।
         आते ही बोला-  माँ पापा  शायद सो रहे हैं। मैं आप लोगों को साथ ले जाने का पक्का इंतजाम करके आया हूँ । आप तीनो के लिये  ऑन लाइन पासपोर्ट का फॉर्म भर कर एजेंट को लगा दिया था।देखो मैं साथ मे लेकर आया हूँ ।अब तीनों को अगले हप्ता वीजा इंटरव्यू देने  दिल्ली चलना  है । माँ  अब आप लोगों को कोई शिकायत का मौका नही दूंगा ।       डार्थी से शादी किया ,तो  मुझे महीने भर में ही वहां की नागरिकता मिल गई  है । हम कभी भी यहाँ आ जा सकते हैँ।महीने भर की छुट्टी मिली है ।मकान ,रेस्टोरेंट सब बेचकर हम चैन से वहीं रहेंगे। सोनल के लिए भी वहीं कोई इंडियन लड़का देख कर शादी कर देंगे।
  सोनल बोली--बस करो भैया।अपनी ही बोलते रहोगे कि हमारी भी कुछ सुनोगे ? जब से आये हो ,पापा के क्या हाल हैं, ये तो तुमने पूछा ही नही? हमने ये कठिन वक्त कैसे काटा ये जानने की जरूरत भी नहीं समझी ।
 अब वसुधा बोली - घर और रेस्टोरेंट बैंक में गिरवी हैं।वो    बिक नहीं सकता।सोनल की पढ़ाई,शादी,और कर्ज भी है।
नीरज --तो ठीक है ।पापा और सोनल  को बाद में ले जाऊंगा।पर माँ आपको तो मेरे साथ चलना ही पड़ेगा।वो कहते हैं न, कि बेटी -बेटे से ज्यादा नाती पोते प्यारे होते हैं ? तो आप भी दादी बनने वाली हो।आपकी बहू नौकरी करती 
है, बच्चा देखने वाला दादी से बढ़कर कौन हो सकता है ?
वसुधा --- बेटा तुझे हमसे अक्सर शिकायत रहती थी, कि हमने  तुम्हें   पब्लिक स्कूल में, नहीं सरकारी स्कूल में पढ़ाया। बहुत अनुशासन में रखा । तो बेटा जैसी हमारी हैसियत और समझ थी। उसमे जो बेहतर लगा वैसे पाला । अब तुम अपने अनुसार अपने बच्चों की परवरिश करो । यहां  हमे हमारे  हाल पर छोड़ दो ।अभी सोनल  की शादी की बड़ी जिम्मेदारी बची है । उसे हम अपने अनुसार  और उसकी इच्छा केअनुरूप पूरी करना चाहते हैं , फिर आगे की बाद में सोचेंगे । तुम खुश जहां रहो खुश रहो.....
डॉ चंद्रावती नागेश्वर
रायपुर छ ग
 दिनांक 20 ,9  2021
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 शीर्षक  --- " प्रायश्चित की अधूरी चाह"
     चार साल से रोग शैया में पड़े M N D नामक पीड़ादायी असाध्य रोग से पीड़ित भानुदास  वर्मा पल -पल मौत को अपनी तरफ कदम बढ़ाते देख मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करते हुए एक दिन सोचे कि मोबाईल में अपने मन की बात को वॉइस रिकार्ड करवा लूं ।उन्होंने अपने भतीजे के 12 वर्षीय बेटे से कहा -  मैं अपनी आवाज में कुछ रिकार्ड कराना चाहता हूँ तुम कर पाओगे । अभय ने कहा -हाँ .... मैं ऑन करता हूँ  आप बोलिये -- हे भगवान कहते हैं कि - सच्चे मन से की गई प्रार्थना  में बड़ी शक्ति होती है । कुछ भी चमत्कार हो सकता है ।हे प्रभु -हे दया निधान ,दीनानाथ --
 मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता।बस ज्यादा नहीं तो पांच  साल  तो की जिंदगी तो मुझे दो। मेरे बच्चों को वो प्यार ,दुलार नहीं दे पाया जो मुझे देना था ।अपने कपड़ों की क्रीज खराब होने के डर से ,सू सू पॉटी के भय से कभी हुलस कर गोद में नहीं  उठाया । इस गलती को सुधारना चाहता हूँ , उनके बच्चों को  खूब दुलार करूँगा । सीधे साधे हीरे जैसे मेरे बच्चे उन्होंने सब जगह मेरा नाम ऊंचा किया । मैं उनका बचपन तो नहीं लौटा सकता पर   मन ही मन खुद को अपराधी मानता हूं ।अब अपने नाती पोते खिला कर ,उनके साथ खेल कर सारी कसर पूरी करना चाहता हूं । 
                मैं बेटों के जन्म पर अपनी अकड़ में रहकर कोई खुशी नहीं मनाया ,कोई पार्टी नहीं दिया । दोस्त, यार ,पड़ोसी सब उलाहना देते रह गए  और मैं टालता रहा । दरअसल मुझे बच्चे ,उनकी जिम्मेदारी बहुत बेकार लगते थे । मैं किसी मित्र, पड़ोसी ,रिश्तेदार के बच्चों को कभी गोद में नहीं लेता था।अब बच्चों की धूमधाम से शादी करूँगा । ऐसी पार्टी करूँगा कि लोग देखते रह जाएंगे । 
            भगवान मेरी प्रार्थना सुनले प्रभु ....अगर  पांच साल नहीं तो तीन साल तो दे दो मुझे।अपनी पत्नी पर जो शादी के बाद से तीस साल तक अत्याचार करता रहा हूँ । उसका तो प्रायश्चित कर लूँ । उसे खूब खुश कर लूँ । उसकी कमाई के पैसों से जिंदगी भर ऐश किया। दोस्तों के साथ खूब सैर सपाटे किया,कोई नई मूवी नहीं छूटती।
मँहगे मँहगे कपड़े पहने, होटलों में खूब खाया ,दोस्तों को और रिश्तेदारों को खिलाया । खूब वाहवाही लूटी।दरअसल मैं बहुत गरीबी  और अभावों में पला हूँ ।  खाने,पहनने को तरसा हूँ ।तो खाओ -पीओ और मौज करो ही मेरी जिंदगी का मकसद था।
 मेरी पत्नी  मुझसे ज्यादा पढ़ी,अच्छे परिवार की समझदार है, साथ ही कमाऊ भी ।घर ,बाहर अपने अच्छे व्यवहार के कारण उसकी तारीफ सुन सुन कर  मेरे मन में उसके प्रति ईर्ष्या और कुंठा पनपने लगी । मैं उसे नीचा दिखाने की कोशिश में बुरा बर्ताव करने लगा। वो जिस काम के लिए मुझे रोकती- टोकतीमैं जान बूझकर उसे तंग करने के लिए वही करता। गलत खान-पान ,आलसी- पन के कारण धीरे धीरे सुगर,बी पी,अस्थमा रोग की गिरफ्त में आ गया ।
 मैंने  घर के बाहर पैदल चलना लगभग बन्द कर दिया।मुझे लगता था। अब मेरा बेटा  दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल डॉक्टर में बन गया है, और मेरी सारी बीमारी का ईलाज हो जाएगा ।लेकिन जब एम्स में  मेरी MND विरल और अनोखी लाईलाज बीमारी के बारे में पता चला  कि पूरे विश्व में इसकी दवा नहीं है । तब भी मुझे विश्वास नहीं हुआ । पत्नी ने कहा- हो सकता है एलोपैथी में ईलाज न हो ।हम आयुर्वेदिक ईलाज के लिए केरल के कोटक्कल के सबसे बड़े अस्पतालआर्यवैद्यशाला में एक महीने तक  भर्ती रह कर सुपर स्पेशलिस्ट  डॉक्टरों द्वारा इलाज हुआ  उन्होंने भी  हाथ खड़े कर दिए ,एम्स हॉस्पिटल के सुविख्यात भूतपूर्व  डॉ. अग्रवाल जो जर्मनी से अध्ययन करके लौटे थे उनका इलाज कराया । उसके बाद तंत्र मंत्र विशेषज्ञ को बुलवाए ,पूजा पाठ,गृहशांति पूजन सब करवाया अब तो कोई उपाय ही नहीं बचा। हे प्रभु-- अब तू ही कोई चमत्कार कर सकता है ।  विगत तीन साल से दोनो हाथ और दोनों पैरों ने काम करना एकदम बन्द कर दिया है अपने सभी दैनिक कार्यों के लिए पत्नी पर आश्रित हो गया हूँ ।  बस दिमाग काम कर रहा है  देखने और सुनने की शक्ति ,सोचने समझने की शक्ति ,स्मरण शक्ति , बोलने की शक्ति अच्छे से काम कर रही है । मेरी पत्नी  पूरे मनोयोग से दिन रात मेरी सेवा में लगी रहती है।  मेरे मित्र ,परिचित,पड़ोसी ,रिश्तेदार सभी अंतिम दर्शन करके चले गए हैं। अब  बिस्तर में पड़े पड़े सोचता रहता हूँ --- कि  मैंने जीवन भर अपनी इसी पत्नी की जीवन भर घोर उपेक्षा की है। उसकी बीमारी, कमजोरी ,थकान, की कभी परवाह नहीं किया। यहां तक कि गर्भावस्था में भी कोई नौकर नहीं रखा ,न कभी घरेलू काम में कोई हेल्प नहीं
  किया ।ऐसा करना  मुझे बीबी की गुलामी करना लगता था।जो मेरे पौरुष की तौहीनी थी। पांच बार उसने गर्भ धारण  किया । तीन पूरे और दो अधूरे बच्चे हुए । मैं प्रसव काल में कभी हॉस्पिटल में नहीं रहा ।पहला बच्चा पैदा होने के 15 घण्टे बाद खत्म हो गया ।  आस पास के बेड वाले बताए। बच्चा रात भर रोता रहा सुबह  9 बजे जब मैं गया तो नर्स ने  बच्चे को मृत बताया ।  वह तो बेहोश थी । होश आने पर अडोस पड़ोस के लोगों ने उसे बताया।  मैं तो उसके सामने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया ।  उसके मायके वाले उसेअपने साथ ले गए ।दूसरे ,तीसरे  प्रसव के समय कुछ दिन कोई आ जाता। अब भी मेरे स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया ।बीबी के पैसे उड़ाने का नशा छा गया था ।
    मेरे दिमाग मे ये बात भरी हुई थी कि घर का काम और बच्चे पालना  औरतों की जिम्मेदारी होती है ।
 बाहर का काम मर्दों का होता है, जो मैं बहुत अच्छे से कर रहा था ।मुझे उसका नौकरी करना पसंद नहीं था । वो अपने शौक के लिए कर रही थी । मेरी प्राइवेट कम्पनी में नौकरी थी ।उसकी सरकारी  ये भी  मेरे लिये कुंठा का कारण था। बार बार नौकरी छोड़ने कहता ।उसने कहा---मैं वचन देती हूं
--- मेरी नौकरीऔर कमाई के पैसे को कभी हमारी गृहस्थी में विवाद का कारण नहीं बनने दूंगी । मैं सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चों की पढ़ाई और उन्हें काबिल बनाने के लिए  है ।  
मेरी तो मौज हो गई।उसके पैसों पर कब्जा बना के रखा था। बैंक एकाउंट में उसे औऱ बच्चों को नॉमिनी तक नहीं बनाया । उसे मैं असहाय बनाये रखना चाहता था । जब तक बच्चे छोटे थे वह 3 -3 महीने में दो तीन दिन ब्रेक करके अवैतनिक अवकाश में  रही। जब स्कूल जाने लगे ड्यूटी जाने लगी ।  बच्चों  की पढ़ाई भी सरकारी स्कूल में हुई । अब उसने मुझे रोकना -टोकना बन्द कर दिया । उसकी जिंदगी का मकसद बच्चों को काबिल बनाना था । 
 बच्चों को बड़े अनुशासन में रखती। उनके टीचर से मिलकर पूरी जानकारी लेती। घर में पढ़ाती, ।सिर्फ  11th और 12th में ,मेथ्स,  फिजिक्स का टीचर नही था, तो ट्यूशन जाते। उसी की मेहनत से बच्चे  बड़े होनहार और टॉपर निकले ।इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता है।  
        मैं सोचता रहता हूँ,  मुझसे शादी करके उसे सिर्फ परेशानी  और कष्ट ही पाया। मैं उसके लिए कभी गहने और अच्छे कपड़े नहीं खरीदा । जब भी बोलती अभी पैसे नही है बाद में .... कहकर टाल देता । उस समय रसोई गैस नहीं था ,कोयला या लकड़ी जलाते ।बच्चेआठवी पढ़ने लगे तब गैसआया, 1995 में टीवी आया। वाशिंग मशीन तो बहुत बाद में खरीदा। मुझे नई बाइक का शौक था  , हर  दो साल बाद बाइक बदलता ।  मैं पत्नी की कभी तारीफ नहीं करता । उसकेअपने कोई खर्च नहीं थे।  हाथ मे दो दो चूड़ियां, बिंदी ओर पोंड्स पावडर यही उसका सिंगार था । वह स्वयं नौकरी कर रही थी ।वह चाहती तो मुझसे तलाक ले सकती थी । पर बड़ी सिद्धांत वादी और समझौता वादी है।सिलाई,बुनाई,कशीदाकारी में एक्सपर्ट है।  
      एम्स के डॉक्टरों ने बता दिया था कि मेरेपासअधिकतम 2साल की ही जिंदगी है ।पर पत्नी की सेवा की बदौलत  चार साल हो गए अभी तक जिंदा हूँ।
अब बीमारी अंदर की तरफ बढ़ गई है। बोलने में जबान लड़खड़ाती है,निगलने में परेशानी होती है । इस समय दिन रात ईश्वर से यही विनती करता हूँ ---
कि  बुढ़ापे  में उसे कोई दुख न देना। हे प्रभु  अगर जीवन में कभी कुछ अच्छा काम किया  हूँ तो  उसका जो भी पुण्य फल होगा ।मीना को देना ......आज मैं तेरे सामने स्वीकारता हूँ ,कि स्वर्ग और नरक  सबको यहीं भोगना पड़ता है। जिस घर को छोटी छोटी खुशियों से मैं स्वर्ग बना सकता था।मैंने उसके लिए यातना स्थल बना दिया ।बीमारी में इन चार सालों में जो मैंने जो तकलीफ झेला।  रौरव नरक से कम नहीं है । मेरी मीना  जैसी पत्नी सबको देना ,लेकिन मेरे जैसा पति किसी को मत देना ......... विदा   ...विदा  ....खुश रहना ....
 प्रस्तुति :---
 डॉ चंद्रावती  नागेश्वर
 22  -9--2021

Friday, 27 August 2021

पुस्तक ---लघुकथा संग्रह "आधी अधूरी रोशनी "

  
           " आधी अधूरी रोशनी "


अभिमत  डॉ इंदुमती मिश्रा

            चन्द्रावती नागेश्वर छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध  वरिष्ठ साहित्यकार हैं।  लेखन की सभी विधाओं पर उन्होंने अपना जौहर दिखाया है। बरसों तक  नवभारत के सुरुचि पृष्ठ,दैनिकभास्कर के मधुरिमा ,अमृत सन्देश ,हरिभूमि पत्रिका में प्रकाशित पाठकों को लुभाती रहीं है ।
                   कुछ  बरस तक  मैं उसी विद्यालय की प्राचार्या रही , हूँ जहाँ वे अध्यापिका रहीं हैं ।  वैसे तोअखबारों में  उनकी कहानियां ,आलेख पढ़ती आई थी, पर सेवानिवृत्ति के समय अपनी 15प्रकाशित पुस्तकें उपहार स्वरूप  विद्यालय के पुस्तकालय को दिया।तब कुछ  कहानी संग्रह पढ़े । 
             अब जब उन्होंने अपनी आगामी पुस्तक "आधी अधूरी रोशनी" के लिए अपना अभिमत लिखने हेतु अपनी 51 लघुकथाएं भेजी हैं। मैं सोचती रही कि कहाँ से शुरू करूँ ??
 अपनी व्यस्तताओं के बीच भी एक बार पढ़ना  शुरू करती तो 3 -4  कहानियां पढ़ लेती । ये कहानियां इतनी रोचक,प्रभावी और उद्देश्यपूर्ण हैं ,कि अधूरा छोड़ने का मन ही नहीं होता ।
            भारतीय संस्कृति और लुप्त होती परम्पराओं,रीति रिवाजों का परचम थामे समसामयिक समस्याओं, घटनाओं और परिस्थितियों  का विश्लेषण करते हुए पाठकों के सुप्त चिंतन को झकझोर देती हैं । पुस्तक की कुछ कहानियां
 विशेष प्रभावी हैं जैसे :--"अभिवादन "की परंपरा चिर प्राचीन होते हुए भी मनोवैज्ञानिक और सदा प्रासंगिक  रहेगी।वास्तव में यह मानव का अदृश्य पहचान पत्र ही है ।
"नामकरण वंदिता का,,,,संस्कारों को जीवित रखने की प्रथा को प्रसंगानुसार भली भांति सजाया गया है लघु कथा के माध्यम से ,,,,,अंत में नामकरण विधि ने मानो चित्रांकित ही कर दिया हो पूरे कथा प्रसंग को।
"शादी की अनोखी..."...मुख्य अंश गृहस्थ जीवन एक तरह का प्रजातंत्र है इसमें तानाशाही की कोई गुंजाइश नहीं* के माध्यम से कथा जीवंत और सुंदर  बन गई है।" करिश्मा मंगल का..."...कथा के माध्यम से  विवाह पूर्व जन्मपत्री मिलान आदि औपचारिकता के विरोध में आवाज उठाई है, सही ही है प्रेम विवाह में कहाँ कुछ देखा जाता है पर पति पत्नी भली भांति ही घर की व्यवस्था संभालते हैं।सुंदर संदेश है। "मास्टर जी की पारखी नजर" में बालिका शिक्षा की अलख जलाई गई है वहीं वधू पक्ष के अपमान में भी एक सुदृढ संदेश महिलाओं हेतु निहित है।
    " जन्मदिन हरीश का "  कहानी के माध्यम से भारत  में जन्मदिन मनाने का तरीका बताया गया । कबाड़ बीनने वाले बच्चे  कौतुहल वश  भीड़ देखकर भंडारे में खाने के लोभ से मंदिर पहुंच जाते हैं । वहाँ  एक सभ्रान्त परिवार उनके  हम उम्र बच्चे का जन्मदिन मना रहे थे। जहां न केक काटा गया
न बैलून सजा।सबने उसे  तिलक लगाया आरती उतारी,  फूल अक्षत बरसा कर लंबी उम्र का आशीष दिया ।
         "तलाक आत्मसम्मान के लिए "कथा मे ग्राफ एक बार पूरा नीचे जाकर उठ रहा है गजब के लोच के साथ कथा संदेश दे रही नारी जाति व समाज को।" रेतीले  रिश्ते"  अद्भुत!अदम्य साहस का और गहन धैर्य परिचय  देता हुआ चरित्र सास व बहू का ,,,,।बिन माँ के मायके के सुख में "एक सुखद चित्रण है।जिसमे मानसी नाम से चिन्हित महिला जो अपने लिए वांछित व्यवहार को ढूंढ निकालती है।
  "पौरुष का अहम" नारी कितनी भी पढी लिखी क्यो न हो पुरुष प्रधानता समाज में आज भी हावी है।
" इंद्रप्रभा "भी सोच व लेखन के आयामों का परिचय दे रही है काश !यह सच होता  और ऐसे समाजोद्धारक और भी होते......! "आत्म सम्मान दुल्हन का "  नारी अस्मिता की 
पराकाष्ठा को रेखांकित करती है । 
              कुल मिला कर इस संग्रह की छोटी छोटी कहानियाँ प्रेरक प्रभावी और पठनीय हैं ।इसकी भाषा
सहज सहज ,सरल  बोधगम्य है । समाज और परिवार के लिए दिशाबोधक और सुखांत हैं । लेखिका अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल हैं।
मेरी तरफ से हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं... 🙏🏻🙏🏻
                                        डॉ इन्दुमति मिश्रा 
                               प्राचार्य शासकीय हायर सेकंडरी                                     स्कूल खैरझीटी राजनांदगांव
                                -------------*---------------*----------
डॉ विनय पाठक

भूमिका    
            
     " आधी अधूरी रोशनी "    
                                                         
        डॉ चंद्रावती नागेश्वर का अवदान सृजन ,समीक्षा और शोध की त्रिवेणी का संधारण करता है।इनके  द्वारा  51 लघुकथाओं का संग्रह * आधी अधूरी रोशनी  *  आपके हाथ में है ।इनमे लघुकथाओं के तत्व भी सन्निहित हैं और एक सार्थक सन्देश संप्रेषित करने का कौशल  है। ये यथार्थ से जुड़े भी हैं और आदर्श की ओर भी मुड़े हैं ।इनमे परम्परा भी है और प्रगतिशीलता का प्रस्तावन भी । इनमें  समकालीन  की जाँच भी  हैऔर   आधुनिकता की आँच  भी।गागर  में सागर या बूँद में समुंद  के दिग्गदर्शन की तरह ये लघु कथाएं सार - सार में सारे संसार का  संदर्शन करा जाती  हैं ।

            " आधी अधूरी रोशनी " इस कृति का भी शीर्षक है और इस  कृति में संग्रहित एक  लघु कथा भी   "आधी अधूरी   रोशनी " जीवन  का भी एक  प्रतीकात्मक अभिधान है । "  और किन्नर विमर्श  का भी  गन्तव्य -मन्तव्य है । प्रकारांतर से यह लघु कथा किन्नर विमर्श के प्रादर्श को भी प्रस्तुत करती है। इसी तरह "जिंदगी के फैसले " लघु कथा में स्त्री विमर्श के बीज दृग्गत हैं ।एक शिक्षित और संस्कारी स्त्री एक छोटी सी बात से टूटते रिश्ते को किस कौशल से संरक्षित करती है।उसकी व्यवस्थित विवेचना है।
       नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को नजरअंदाज करके व्यवहार और   संस्कार से कैसे व्यवहार और संस्कार से कैसे कट रही है इसका निरूपण करते हुए सही दिशा की ओर दिगदर्शन लघुकथा 'हमारी पहिचान'  का संदेश है  ।इसी तरह " माँ का पूर्वाग्रह शीर्षक लघुकथा में संस्कारी , सुशिक्षित ,सौम्य बहू की उपेक्षा करनेवाली पूर्वाग्रह ग्रस्त सास के पश्चाताप का निदर्शन है । "तौर  तरीकों का प्रभाव"और "रेतीले रिश्ते " शीर्षक भी सार्थकता को सिद्ध करते हैं । "बिन माँ के भी मायके का सुख  " शीर्षक लघु कथा इस भ्रम को  को तोड़ता है कि माँ के स्वर्गवास के बाद  मायके का मोह नहीं रह जाता।  यह ठीक है कि माँ का घर सास का कहलाता  है ,लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि भाई भाभी से उसका नाता नहीं रह जाता। प्रेम और व्यवहार से रिश्तों में  ताजगी बनी रहती  है। इस तथ्य को यहां पुष्ट किया गया है ।
                "लोग क्या  कहेंगे "?और  "सेवा सम्मान से सन्तुष्टि "विषयक दोनो लघु कथाएं वृद्ध विमर्श के वितान को विनिर्मित करती हैं ।यदि विधुर वृद्धावस्था में  विवाह करता है ,तो  उसे एक साथी सहयोगी की आवश्यकता के कारण । लेकिन वहओ समाज और परिवार के  आलोचना की परवाह नहीं करता । क्योंकि उसकी समस्या का समाधान उसके पास है । समाज और परिवार के पास नहीं। ऐसे अवसर पर समाज और परिवार की  उपस्थिति  तमाशबीन के अतिरिक्त  और कुछ नहीं होती ।
     सेवा सम्मान और संतुष्टि वृद्धाश्रम को केन्द्रस्थ करके लिखी गई है । इस तरह नव्य विमर्श के साथ  वर्तमान विषय को विवेचित करके ,कोरोना- काल के कहर से परिचित करा कर के और दैनन्दिन की घटनाओं में से तथ्य को कथ्य का स्वरूप देकर जो तन बाना  संजोया है ,वह महत्व पूर्ण है । 
        इसकी भाषा सहज,सरल ,सुगम और सुबोध है तथा मुहावरों, कहावतों के यत्किंचित प्रयोग से  प्रभावोत्पादक भी बन पड़ी है। इस महत्वपूर्ण रचना के लिए डॉ नागेश्वर बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं  .......                                                                         डॉ विनय पाठक
पता :-                        
                         .    पी एच.डी. ,डी लिट् ( हिंदी)
पता :-                         एम .ए . पी एच.डी.,डी लिट्(हिंदी)
C/62 
अज्ञेय नगर
 बिलासपुर                   पी एच.डी. ,डी लिट् (भाषा विज्ञान                                           निदेशक -प्रयास प्रकाशन

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अभिमत 
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जमीन से जुडी कथाकार हैं डॉ . चन्द्रावती नागेश्वर 
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          *  आधी अधूरी रोशनी   *            
कथा- कहानी - किस्से हमेशा कल्पना की उड़ान माने जाते रहे हैं , बहुत थोड़े से कथाकार ऐसे होते हैं जिनकी कहानियाँ संस्मरणात्मक बोध कराती हैं । कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद एक मात्र ऐसे कथाकार हुए हैं जिनकी कहानियों को पढ़कर कभी नहीं लगा कि जो कुछ भी पढ़ा जा रहा है वह कल्पना है , उनकी कहानियों के पात्र , उनकी संवाद शैली और वर्णनात्मक कहन पाठक को जमीन से जोड़ देती है । आज समय बदल गया है , बड़े आकार और  कलेवर की कहानियाँ नहीं लिखी जातीं। न पाठकों के पास समय है और न कथाकार के पास धैर्य ! सबकुछ लघु से लघुतर होता जा रहा है । हमारे कथाकारों का रुझान लघु कथाओं की ओर बड़ी तेजी से हुआ है । कविताओं में जिस तरह क्षणिकाएँ या लघु कविताएँ होती हैं ,लगभग वैसी ही स्थिति अब इन मिनी कहानियों की है। ऐसी स्थिति में लघु कथाकार कल्पना के पंखों पर किसी कवि की तरह विचरते देखे जा रहे हैं । कथाकार डॉ. चंद्रावती नागेश्वर जी की कहानियाँ इसका अपवाद हैं । वे कल्पना की ऊँची उड़ान नहीं भरतीं वरन सच की जमीन पर अपनी कहानियों को रचती हैं । उनके पात्र हमें अपने आस-पास के ही नजर आते हैं । ऐसा लगता है वे अपनी स्मृति वीथिका से कतिपय  सुन्दर  और सार्थक संस्मरण लिख रही हैं ।
    उनकी "आधी अधूरी " लघु कथा कृति की पांडुलिपि का अध्ययन करने का सौभाग्य मुझे मिला है।
 कहानियों को गढ़ने की उनकी अभिनव शैली की कहन, वर्णनात्मक और सहज प्रस्तुति आकर्षित करती है। आज के युग में जब आभासीय डिजिटल लेखन के आगे मुद्रित प्रकाशन से लोग धीरे धीरे दूर होते जा रहे हैं,  उनका कथा संसार चमत्कार से कम नहीं है । एक बार उनकी इन लघु कथाओं को पढ़ना शुरू करने के पश्चात पाठक अंत तक जिज्ञासु बना रहता  है इसलिए बिना समाप्त किये पढ़ना बीच में नही छोड़ता ।
            अब बात चाहे स्त्री विमर्श की हो , किन्नर विमर्श की या सामान्य जीवन में घरों में कार्यरत पात्रों की उनकी प्रत्येक कहानी  तथ्यपरक सन्दर्भों ,घटनाओं और सहज  कथ्य में पिरोई हुई लगती है । एक सार्थक सन्देश होता है ।उनकी हर कथा में , उदाहरणार्थ एक लघु कथा " तौर तरीकों का प्रभाव "  को लेते हैं जो विदेश में रह रहे बेटा-बहू और उनके छोटे से बच्चे को लेकर लिखी गई है -
          "अनिरुद्ध की माँ आज ही भारत से अमेरिका आई है।  बेटा -बहू  केलिफोर्निया में नौकरी करते हैं। तीन माह के पोते ऋत्विक  को उसे सम्हालना है। उसके बेटा बहू दोनो एक मल्टी नेशनल कम्पनी में जॉब करते हैं। रात के डिनर के बाद जब वह सोने जा रही थी , तब उसने देखा कि अनिरुध्द  ऋत्विक को सुला रहा है । औऱ वह बच्चा लगातार रोये जा रहा  है,तब जमुना देवी  ने बहू से कहा--स्वीटी बेटा देखो तो  बच्चा बहुत रो रहा है ।शायद सोना चाहता है या फिर भूखा है ...
--जी मम्मी .... उस दिन तो बहू ने उसे सुला दिया।
  फिर दूसरे दिन वही क्रम दुहराया गया।   बच्चे को पिता सम्हालता रहा और वह  घण्टों रोता रहा ..
.तीसरे दिन भी बच्चा अलग कमरे में  रोता रहा .......
  अब चौथे दिन जमुना देवी से नहीं रहा गया । उसने कहा--- तुम लोग बच्चे को रोज रात में इतना क्यों रोता है ?
 रोज ही रात को स्वीटी काम लेकर बैठ जाती है। अनिरुद्ध से बच्चा सम्हलता नहीं  है रोता रहता है। मुझे भी गोद मे लेने से या चुप कराने से मना करते हों।आखिर क्यों ????
 स्वीटी ने कहा ---  मम्मी जी ये इंडिया नहीं अमेरिका है। यहाँ बच्चों को पालने औऱ रहन, सहन के तौर- तरीके  बहुत अलग हैं। अब हमें अमेरिका में ही रहना है ,तो यहां के तौर तरीके से अपने बच्चे पालने हैं। 
जमुना जी -- स्वीटी तुम भी भारत में जन्मी,पली,बढ़ी हो। अनिरुध्द भी  वहीं के तौर -तरीके से पला बढा है। उसमे क्या कमी है ?ये तो बताओ...
 स्वीटी- यहां के स्पेशलिस्ट डॉक्टरों कहना है, कि छोटे बच्चों को पैदा होने का बाद जितनी जल्दी हो सके या एक महीने के भीतर ही माँ से अलग दूसरे कमरे में अकेले सोने की  आदत डालनी चाहिए । इससे उनका  शारीरिक और मानसिक विकास तीव्र गति से होता है। उनकी नींद डिस्टर्ब नहीं होती । वे जल्दी  आत्मनिर्भर बनते हैं स्वस्थ रहते हैं। । पति भी शिशुपालन में प्रतिदिन सक्रिय भूमिका निभाये यह अनिवार्य है।" 
                 अनिरुद्ध की माँ समझाती है कि बच्चे को उसकी माँ के पास ही सुलाना चाहिए । 
         " बिन माँ के भी मायके का सुख " एक बहुत सुन्दर किन्तु भाव-प्रवण कहानी है , भाभी का किरदार सचमुच अनुकरणीय  है । इन्द्रप्रभा , शहीद की पिता अगवानी ,पढ़ा लिखा  होता  तो, पौरुष का अहम् , दोस्ती ऐसी भी , लोग क्या कहेंगे - कई कहानियां हैं जो प्रभावित करती हैं । बहू के पुनर्विवाह का निर्णय -सामाजिक बदलाव की सुखद बयार है । अनुकम्पा नौकरी , ऐसी है निर्मला बहू, हौसला जैसी 51 लघु कहानियों की इस  माला में अद्भुत आभा  से दमकते मोती पिरोये गए हैं । श्रेष्ठ कथाओं का सुष्ठु सृजन करने के लिए डॉ. चन्द्रावती नागेश्वर जी को हार्दिक बधाई देते हुए मेरा विश्वास है कि इस श्लाघनीय कृति को सुविज्ञ पाठक हाथो हाथ लेंगे । शुभमस्तु 
      ------ प्रो.विश्वम्भर शुक्ल (अवकाश प्राप्त प्राचार्य , लखनऊ विश्वविद्यालय सम्बद्ध पोस्ट ग्रेजुएट कालेज ,गोलागोकर्णनाथ, खीरी  )
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सम्प्रति निवास - 538 क/ 90 त्रिवेणी नगर प्रथम 
लखनऊ - 226020
चलभाष - 9453618200
ईमेल- vdshukla01@gmail.com

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   कहानी  का लघुस्वरूप जिसमे कथा के सभी तत्व समाहित हों  यह जरूरी नहीं है, पर जो भी तत्व आते हों इसके वैशिष्ट्य को बखूबी निभाते हैं ,इसीलिए कहानी का संक्षिप्त संस्करण भी नहीं है । इसका शिल्प अलग ही है।(1) यह" गागर में सागर"को सँजोता है यह सार-सार में सारे संसार को समेट लेता है ।(2) बिना एकांगी विस्तार के लक्ष्य सिद्ध करता है(3)औत्सुक्य के साथ कथा प्रवाह भी है।लक्ष्य भेदन की क्षमता भी है कल्पना से अधिक वास्तविकता में विश्वास करती है।वास्तविकता का ऐसा वितान बनाती है,  जिसमे समाज,परिवार की मानसिक राजनैतिक,आर्थिक सांस्कृतिक परस्थितियां  पृष्ठभूमि के रूप में स्थापित हो जाती हैं ।  (4) वामन में विराट का भान कराने वाली होती हैं।  प्रतीकों का प्रयोग, संकेतों के उपयोग के साथ अप्रत्यक्ष कथन  के सहयोग से पूरित होती है ।कल्पना वहीँ तक ग्राह्य है,जो यथार्थ को स्पर्श करे ,संवेदना वहीं तक मान्य है जो ,बुद्धि को परामर्श दे । यहां प्राचीन में नवीन का उन्मेष निरखता है ।(5)  लघु कथाकार इतिहास ओर पुराण को वीथियों में खो नहीं जाता वरन उसके  "प्राचीन कथ्य " को आज के " तथ्य " से सामंजस्य बिठा कर  उसे इस तरह प्रस्तुत करता है कि वह सजीव और सप्राण हो जाता  है । इतिहास दुहराया जाता है पुराण का पुनः पारायण किया जाता है । (6)लघु कथा एक ध्येय ओर पाथेय पर प्रस्थित है। समय -सत्य को शाश्वत  सिद्ध करना इसकी विशेषता है 
कल्पना से अधिक वास्तविकता में विश्वास करती है। समय -सत्य को शाश्वत  सिद्ध करना इसकी विशेषता है।
           लघु कथा में स्वतंत्र शैली के साथ ही   विषय के अनुरुप  व्यंगात्मक ,पत्रात्मक,संस्मरणात्मक ,संवादात्मक शैली को भी अपनाती है ।   
  सूत्रात्मक भाषा,सामासिक शब्दप्रयोग, सार्थक मुहावरे और लोकोक्तियों के योग से भाषा जहां कारगर बनती है ,वहीं समग्रता को समेटकर अर्थवत्ता को सहेजती भविष्य के सांचे में ढलकर ,संवाद के पिंजर में पलकर जानदार बनती है। लघु कथा लघु विश्व दर्शन  का लोकप्रिय ललित माध्यम है ।
                        

Sunday, 15 August 2021

लघुकथा श्रृंखला :---(40 ) मायके का सुख बिन माँ के , रिश्तों का अंकुरण, राखी का अटूट बन्धन ,देह हमारी अधिकार पराया

     "बिन माँ के भी मायके का सुख"
          छोटे भाई  शिवेश के बेटे  रौनक का विवाह है।  कई बरस के बाद  मानसी  भाई के घर आई है। ये भी तो   मायके का  वही घर  है । जो दो हिस्सों में बंट गया है ।अपने इस  मायके में  मानसी को माँ की कमी बहुत खल रही है ।
लगभग  दस साल पहले ही हार्ट अटैक से माँ स्वर्ग सिधार गई थी। तब बुआ ने कहा  था  --  बिट्टो अब तो तेरा मायके से नाता ही टूट गया । सच ही कहा था उन्होंने --  माँ के रहते ही  मायका होता है ।
       उसके बड़े भैया  मुकेश और भाभी  अपनी दुनियां  में मगन रहे  ।  मानसी को दोनो में से किसी ने कभी तीज -त्यौहार में नहीं बुलाया ।
        पिता जब तक जिंदा थे ,सिंघोरा लेकर खुद उसके ससुराल जाते  और मिल कर आ जाते । माँ के जाने के  चार साल बाद  वो भी इस दुनियां से विदा हो गए ।  
     अपने ससुराल में बेटी चाहे कितनी सुखी रहे । पर माँ - पिता की ममता  के छांव तले  उसका बचपन जी उठता है । यहां के हर गली चौराहे  से ,अपने घर आंगन की दीवारों से  एक आंतरिक लगाव की अनुभूति होती है। यहाँ आकर  वह दादी की लाड़ो, अम्माँ की बिट्टो, पिता की राजकुमारी, दादू की सोन चिरैया , चाची की गुड़िया , साखियों की मानी  बन जाती।बचपन मे कोई ,चोटी गूंथ देता ,   कोई फूलों की  वेणी सजा  देता ।      यहीं आकर तो  ससुराली रिश्तों की जिम्मेदारी से मुक्त होकर  खुली हवा में सांस ले पाती थी वह । बिना रोक टोक के खिलखिलाकर कर अपनी  बचपन सखियों के साथ हँस पाती । 
                   ससुराल में तो मान -मर्यादाओं का आँचल सिर पर ओढ़े गर्दन झुकाये  पल में बहू ,पल में चाची ,पल में भाभी ,पल में  मम्मी के रिश्तों में सिमटी ,अनेक वर्जनाओं में बंधी कठपुतली सी डोलती  अपने अस्तित्व को ढूंढती रह जाती  है ।
                             बेटियाँ इतनी सहज ,इतनी सरस और निश्चिंत होकर  अपने आप से मायके में ही मिल पाती हैं। प्यार ,मान और  लाड़ ,दुलार की संजीवनी पाकर  यादों की अनमोल  सौगात लिये वह नम आंखों से  मायके से विदा होकर अपनी  गृहस्थी में  खो जाती है । 
             मानसी की बड़े भाई की बेटी  जयश्री  की शादी में वह  अपने सास की बीमारी के कारण नहीं आ पाई थी   जयश्री  अपने दो बच्चों के साथ शादी में आई है । बुआ  से लंबे समय बाद वह मिल रही है । रेल दुर्घटना में  बड़े भाई  के निधन के बाद से रमा भाभी   मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गई  है, तब से  जय श्री अपने पति अनूप के साथ  अपने मायके में स्थायी रूप से रहने लगी है। उसके पति  यहीं रेडी मेड कपड़ों का बिज़नेस करते हैं।
            शादी  के कार्यक्रम समाप्त होने के बाद  जयश्री बड़े मनुहार से अपनी बुआ को  बोली -- बुआ चलो हमारे साथ अपने बड़े भाई के घर कुछ  दिन रह लो।मेरे बच्चे आपके सानिध्य  
 में कुछ सीख जावें ।                        
            अब फूफा जी भी नहीं रहे । आपके बेटा बहू तो महानगरों में रहते हैं । आप भिलाई में अकेली  ही रहती हो । कहा जाता है कि बेटियों को अपने मायके से  बहुत लगाव होता है।बुआ चलो न मेरे साथ।
आपका मायका आपको बुला रहा है। मानसी बोली --- मेरा मायका तो माँ के शरीर छोड़ते ही छूट गया । अब कौन है वहाँ । भाई तो अपने जिंदा रहते  रिश्ता नहीं निभा पाया तो अब वहां क्या बचा  है  मेरे लिये ? 
 जयश्री --  आपके माँ पिता का घर तो है ,उसके छत की छांव में आपका भी तो हक  है । वो घर तो मेरे भी पिता काऔर उससे पहले  आपके पिता  का है । मैं भी अपने पिता के घर  याने अपने मायके में रहती हूं और आप  भी अपने भाई के घर याने  मायके में  जब तक मर्जी चाहे रह लेना । 
             बेटी ही बेटी  के मन की भावनाओं को समझ सकती है यह सोचकर मानसी ने अपनी भतीजी को गले लगा लिया । दिल से ढेर सारी दुआएँ  देती रही । उसका मन रखने  उसके साथ भी  भी गई । मनको बड़ा सुकून भी मिला । सप्ताह भर रह कर वापस जाने की बात कही तो  जयश्री बोली अभी पांच दिन बाद होली है । इस बार  हमारे साथ होली मना के  जाना। अपनी शादी के बाद मैं हप्ता भर से ज्यादा अपने मायके में रहने  का मौका ही नहीं   मिला। 
  होली के   बाद से  कोरोना बीमारी फैलने के कारण   राष्ट्र व्यापी लॉक डाउन लग गया । आवागमन के साधन बन्द हो गए।घरों  में सब कैद हो गए । मानसी के मन में संकोच बढ़ने लगा ,कि  उसके कारण राशन खर्च का बोझ बढ़ रहा है । पुराने लोग बेटी के घर  पानी भी नहीं पीते । और मैं चार महीने हो गए बैठे बैठे आराम से खा रही हूं ।
 उसके मन का संकोच दूर करते हुए जयश्री  अपनी बुआ को बार बार याद दिलाया करती -- बुआ आप  खर्चे की चिंता बिल्कुल  मत करना । क्योंकि  हर महीने मेरी मम्मी को पापा की  अच्छी खासी पेंशन मिलती है ।वे रेलवे में ए ग्रेड ड्राइवर थे ये जानती हैं न ?? आप अपने भाई के घर की मेहमान हैं। बड़े भाई पर आपका हक बनता है ।
              लॉक डाउन के बाद  जयश्री के पति पूरे मान सम्मान के साथ  ब्यौहार देकर मानसी को भिलाई पहुंचा कर वापस गए ।जाते समय कह गए -- बुआ मुझे दामाद नहीं अपना तीसरा बेटा ही समझना।जब भी जरूरत हो बुला लेना ।
 डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
 रायपुर  छ ग 
दिनांक 12 ,8,2021
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" नए रिश्तों का अंकुरण"

    निशा के 11और 9 वर्षीय  बेटे तन्मय और चिन्मय ने राखी के दिन सुबह सुबह  अपनी माँ से पूछा -- 
  माँ आज राखी का त्यौहार है न?
 निशा --- हाँ तुम दोनों जल्दी से तैयार हो जाओ  अभी 1घण्टे बाद पड़ोस की  नित्या और नायरा  तुम दोनों को राखी बांधने आएंगी।
तन्मय :- नायरा तो अमान की और नित्या सक्षम की बहन हैं ।हम उनसे राखी कैसे बन्धवाएँगे ?? 
 चिन्मय भी बोला :- हमें तो हमारी बहन चाहिए।  हमे तो उसी से राखी बंधवाना है ।
 माँ --- बेटा इस दुनियां में  भगवान सबको सब कुछ नहीं देता । हर घर में,  हर परिवार में,हर व्यक्ति में कुछ न कुछ कमी छोड़ देता है । ताकि हम लोग अपने विवेक और प्रयास से  उस कमी को पूरा करके खुश रहना सीखें। 
  किसी के घर बेटा ही बेटाहै तो  किसी के बेटी  ही बेटी ,किसी के पास  धन है तो जन नहीं, कहीं जन है तो धन नहीं 
         चिन्मय  -- अच्छा चलो ठीक है ,पर माँ उन्हें बदले में गिफ्ट भी तो देना पड़ेगा ...  
 माँ -- हां बेटा दुनियां लेन -देन से ही गतिमान बनती है। जब कोई व्यक्ति हमको किसी भी रूप में कुछ भी देता है ।तो उसके उपकार के बदले कुछ न कुछ उपहार अवश्य देना चाहिए । तभी सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं  लंबे समय तक चलते  हैं ।  
 प्रेम का बदला प्रेम से, सेवा  का बदला सेवा से ही  चुकाया जाता है । सेवा ,प्यार और त्याग की कीमत पैसों से नहीं चुकाई जा सकती ।
      चलो बातें बहुत हो गई। नित्या और नायरा आती ही होंगी।  तन्मय बोला -- माँ मैं अपना गुल्लक  तोड़कर   उनके लिए   चॉकलेटऔर हेयर क्लिप  खरीदकर ले  आता हूँ । मैं गिफ्ट के लिए आपसे पैसे नहीं लूंगा।
 चिन्मय -- माँ मेरे पास नई वाली पेंसिल बॉक्स है उसे दे दूँगा       नित्या और नायरा अपनी अपनी मम्मी के साथ आई ।  दोनो भाइयों को पटे पर बैठा कर आरती थाली में दीप जलाकर ,कुमकुम अक्षत से तिलक लगाया ,राखी बांधी,  आरती उतारी । माँ ने कहा ---   आज से आप लोग भाई बहन  बने । एक दूसरे से प्रेम पूर्वक व्यवहार करोगे ,एक दूसरे की रक्षा करोगे ।  
इस तरह  उन बच्चों के मन में  राखी के धागों के माध्यम सेभाई बहन के रिश्ते का बीज  अंकुरित हुआ । हर साल राखी के दिन का उन्हें इंतजार रहेगा । यह पर्व उनके रिश्तों का नवीनीकरण करता रहेगा।
     नित्या की माँ  ने बताया--- कुछ रिश्ते जन्मजात होते हैं कुछ  कर्मजात होते हैं ,जो दसमय ,उम्र,जरूरत  के अनुरूप बनाये जाते है ये मनः जात होते हैं । विवाह के बाद पति -पत्नी का रिश्ता भी  मन की भूमि पर  बोया जाता है । हर तरह के रिश्तों में स्वार्थ,  लोभ और अपेक्षा नहो तो आजीवन  खुशी देते रहते हैं ।
डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर छ ग 
20,  8,2021 

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 शीर्षक। -   " राखी का अटूट बन्धन"
आज  शाम को खुशी खुशी शुचि  ने अपने पति ब्रजेश को बताया--    आज विनोद भैया का फोन आया था कि नारायण पुर से अपना का पूरा करके  दो दिन बाद मुझे लेने आएंगे ।
  ब्रजेश -- कितनी उतावली हो रही हो मायके जाने के लिए। तुमने ये भी नहीं सोचा कि  तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हो जाऊंगा।शुचि -- आप भी तोअपने मायके जाने वाले हो।          अपनी बहन से राखी बंधवाने । मैं इतनी जल्दी वापस नहीं आऊंगी । मैं तो तीज के बाद ही आउंगी और पता है , भैया के साथ उनके मित्र विशाल भी आएंगे मुझे लिवाने।उनकी कोई बहन नहीं है न ,तो मैं बचपन से ही उनको भी राखी बांधती हूँ। 
  दूसरे दिन सुबह ब्रजेश चाय पीते हुए नवभारत पेपर की हेडलाइन देख ही रहे थे , कि दिल धक.... से हो गया  -- लिखा था  नारायनपुर एरिया में विशेष सर्च आपरेशन  से लौटते  समय बारूदी सुरंग में विस्फोट से आई टी बी पी के जवानों को लेकर आ रही जीप परखच्चे उड़ गए । जीप में सवार ए एस आई विनोद शुक्ला सहित  3 जवान शहीद हो गए । उन चारों की तस्वीरें भी छपी थी ।  ब्रजेश ने शुचि से कहा--शुचि अभी तुम्हारी दीदी  ने फोन पर बताया है कि-- -तुम्हारी माँ की तबियतअचानक खराब हो गई है ।तो मैं तुम्हें और उन्हें अभी  तुम्हारे  मायके छोड़ आऊं ।
    तुम जल्दी पैकिंग कर लो ।मैं  गाड़ी निकालता हूँ ।ब्रजेश दोनो को लेकर तीन धण्टे  में ससुराल पहुंच गए । वहां का सन्नाटा देख कर दोनों बहनें सकते  में आ गयी ।  पास पड़ोस के लोग धीरे धीरे आने लगे थे।पर कोई किसी के कुछ बोल नहीं रहा था । ब्रजेश ने ससुर जी को पेपर दिखाया उनको धीरज बंधाया।  खबर सुन कर माँ तो चीख कर अचेत हो गई । माहौल गमगीन हो गया । रोना धोना मच गया। पल भर में  भीड़ जमा हो गई।     विशाल भैया तो पहले से आगये थे पर किसी को कुछ बताने की हिम्मत नहीं
कर पाए थे ।
उन्होंने  हेडक्वाटर से  यह पता कर लिया  था -- कि  विनोद को  कल घर लाया जाएगा । पुलिस गाड़ी  में उनके साथ पुलिस टुकड़ी भी आई ।पूरे  सम्मान  के साथ  उनकी अंत्येष्टि हुई ।
           विशाल ने सबके सामने  दोनो बहनो के सिर पर हाथ रखकर  शपथ  ली -- कि आज के बाद सें विनोद की जगह मैं भाई के सारे फर्ज निभाउंगा ।  अंकल आंटी की देखभाल भी करूँगा .
 मैं बहुत छोटा था तब से मेरे पिता का स्वर्गवास हो गया है।अब आप मेरे  ताऊ और ताई  हैं । मेरी माँ  का अकेलापन दूर होगा । माँ के साथ मिलकर मेरी शादी भी तो आप लोगों को  करानी हैं। .....
डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर     छ ग
 22 ,8  ,2021

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"श्रावणी पूर्णिमा का पर्व रक्षा बंधन"
      सावन के महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह पुण्य पर्व कई मायनों में जीवन की पूर्णता का प्रतीक है।             आषाढ़  के मतवाले मेघ  घुमड़ घुमड़ कर जब  बरसते हैं। तब गीली धरती की कोख  में सुप्त बीजों का अंकुरण होता है।    
          वनस्पति जगत अंगड़ाई ले कर उठ खड़ा होता है  धरती माँ का ममता भरा स्पर्श पाकर  वह मृग छौनों की तरह चौकड़ी भरने लगता है।सावन के आते तक वसुन्धरा हरी चुनरी लहराती हुई पुरवा हवा के साथ झूमती नजर आने लगती है । धरती की हरियाली से जन जीवन में खुशियाली छा जाती है । मानव मन  भी प्रकृति को देख के झूमने लगता है खुशी मनाना चाहता है ।परिजनों के साथ खुशियां बांटना चाहता है ।

  इसी कड़ी में भाई  बहन  के आपसी प्रेम को चिरजीवी बनाने ,सामाजिक सद्भाव को विस्तार देने के लिए रक्षा बंधन का पर्व  मनाया जाने लगा।
कहा जाता है ,कि द्वापर युग में एक बार कृष्ण की कलाई में चोट लग गई, तब द्रौपदी ने उनके बहते रक्त को रोकने तुरन्त अपनी  रेशमी साड़ी का पल्ला फाड़ कर उनके हाथ  में पट्टी बांध दी।
कृष्ण ने उसी समय द्रौपदी से कहा -- बहन आज से मैं तुम्हारा 
 ऋणी हूँ । मैं तुम्हें वचन देता हूँ ,कि  विपत्ति के समय जब भी तुम्हे मेरी जरूरत पड़ेगी मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा । वह श्रावणी पूर्णिमा का दिन था । तब  से रक्षा बन्धन मनाया जाने लगा।
          यह भाई बहन  के प्यार का, कर्तव्य बोध का, सद्भाव का,मेल मिलाप का और  खुशियों का त्योहार है  ।
         हर मानव अपने जीवन में खुश रहना चाहता है ।उसकी जिंदगी का मकसद ही  आनन्द की खोज है। 
                    इस भौतिक जगत में  ईश्वर ने सबको सब कुछ नहीं दिया है। कुछ न कुछ कमी छोड़ रखा है । ताकि  इस कर्ममय संसार में मानव  सतत कर्मशील बना रहे ।  अपनी बुद्धि,विवेक ,  युक्ति  से ईश्वर द्वारा दी गई कमी को पूरा करने का मार्ग ढूंढ कर खुश रह सके ।  पारिवारिक और सामाजिक    समन्वय के लिए भी यह जरूरी है ।
         बिना रिश्तों के व्यक्ति खुश नहीँ रह सकता है। कुछ रिश्ते  जन्म से ही बन जाते हैं। इन्हें जन्म के रिश्ते या खून के रिश्ते कहते हैं । कुछ कर्म के रिश्ते होते हैं जो जरूरत,उम्र ,परिस्थिति  केअनुसार बनाये जाते हैं। ये कर्म के रिश्ते या मन के रिश्ते या माने हुये रिश्ते कहलाते हैं।
             जिनके  भाई या बहन नही होते  वे राखी- बंध भाई या बहन का रिश्ता बनाते और निभाते भी हैं । यह रिश्ता सबसे पावन रिश्ता होता है ,मित्र या दोस्त का रिश्ता, सन्तान हीन दम्पत्ति  बच्चा गोद लेकर गोद पुत्र या गोदपुत्री का रिश्ता बनाते हैं।
   सात फेरे लेकर,या मंगलसूत्र पहना कर , मांग में सिंदूर भरके 
पति -पत्नी का रिश्ता बनता है ।
जीवन में पूर्णता पाने और खुशी पाने रिश्ता बनता है या बनाया जाता है।  उम्र ,परिस्थिति,अनुभव और समझ में बदलाव भी आता है तब रिश्तों में टकराव भी आता है ।व्यक्ति की जब  किसी से उम्मीदें,अपेक्षाएं बढ़ने लगती है तो रिश्तों में दरार आने लगता है । 
      हमे यह ध्यान रखना चाहिए ,कि  रिश्ते खुशी पाने के लिए होते हैं ,खुशी निचोड़ने के लिए नहीं । हर तरह के रिश्तों को स्नेह रस से सींचते रहना चाहिए । सम +बंध= सम्बंध  --समान  रूप से बंधे रिश्ते ही दीर्घकालीन होते हैं 
 डॉ चंद्रावती नागेश्वर 
 रायपुर। छ ग 
22  ,08  ,2021
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 शीर्षक --"देह हमारी -अधिकार पराया "
 

               मालती और रश्मि  दोनो अपने उम्र के सातवें दशक में हैं ।  दोनो हम उम्र  सहेलियों  में लगभग तेरह की उमर से ही पक्की दोस्ती है । तब वे आठवी कक्षा में पढ़ती थीं ।मालती की बेटी अर्पिता ने बताया कि आज रश्मि मौसी आने वाली है । दोनो आज दिन भर आज  साथ खएँगी ।  ऊपर कमरे में  दरवाजा बंद कर के   खूब बातें करेंगी । शाम को बम्लेश्वरी मंदिर में दर्शन के बाद पीछे चबूतरे में बैठ कर घण्टों बात करेंगी ।
देखो मालती मौसी का ही कॉल है -   कैसी हो रश्मि ? बच्चे कैसे हैं ? बहुत दिनों तुम्हारी कोई खबर नहीं मिली ?
 रश्मि - ठीक हूँ ।दोनो अपनी गृहस्थी में खुश  हैं। तू अपनी बता  कैसी है ? इस बार काफी दिनों बाद आने की 
 फुरसत मिली ।
रश्मि--   मैं अच्छी हूँ । इस कोरोना और लॉक डाउन ने तो जिंदगी में बहुत उथल पुथल मचा रखी  है। सबके मन में एक दहशत भर गया है।  अच्छा मालती सुन तुम्हें एक बात बतानी है । मैंने  मृत्यु उपरांत अपना देहदान करने का निश्चय कर लिया है। देहदान के फॉर्म में गवाह में तेरा सिग्नेचर लेना है ।इसीलिये आ रही हूं ।
 मालती - तुम ऐसा कैसे कर सकती हो ?
          तुम्हारे दोनो बेटे  बड़े समझदार और संस्कारी हैं।उनके रहते देहदान तुमने सोच भी कैसे लिया ???
  रश्मि --   क्यों नहीं सोच सकती ???  ये देह मेरी है  इसके द्वारा किये गए पाप -पुण्य मेरे कर्म लेख के खाते में   लिखे  जाते हैं । तो इस शरीर  को दान करके पुण्य कमाने  का अधिकार मेरा अपना निर्णय होना चाहिए न???  मालती --- हाँ  बात तो सही है पर  ......
  मृत्यु के बाद अंतिम ... क्रिया ...  का.. ह ...क तो बेटा या पति  का है।बेटा न हो तो बेटी या गोत्रज रिश्तेदार का। 
 रश्मि --- समय -परिस्थिति ,जरूरत के अनुसार मान्यताएं बदलती हैं। शैशव काल में  इस शरीर की देखभाल और जरूरतों का खयाल माता -पिता /अभिभावक रखते हैं । उसके बाद हमारी शादी होती है - ये  हक पति / सन्तान  को मिल जाता है ।  हमारे शरीर पर ,मन पर,इच्छाओं पर  कभी हमारा अधिकार होता ही नहीं ??? यहां तक कि मरने के बाद भी  क्यों    न .. हीं...
        मैने तो देहदान के बारे में निश्चय भी कर लिया.... 
  रश्मि --- अरे बहन वो कहावत है- शुभस्य शीघ्रम और
तुरत दान महा कल्यान ...भई  हम तोजीवन में कोई बड़ा दान कर नहीं सके।घर गृहस्थी ,बच्चों के पालन -पोषण पढ़ाई- लिखाई के चक्कर में ही रह गये,और किसी भी तरह के दान नहीं  कर पाये ...  जो किया वह पति ,पिता , भाई, बेटे  बेटी की कमाई का हिस्सा था... तो  पुण्य  उनको ही मिलेगा न??
 दान कई तरह का होता है ।जैसे :--धन,वस्त्र,सुवर्ण,रजत,तांबा ,विद्या,रक्तदान ,अंगदान ,प्राणदान,तो नहीं कर पाये, लेकिन मरने के बाद देहदान  तो कर ही सकती हूं न ??? जिससे मन को कुछ  तो सन्तुष्टि मिल सके......वे देह मेरी है तो इसे दान करके 
 इससे पुण्य पाने का हक मेरा बनता है न???.
  मालती तुरन्त बोली --- पर  शास्त्रों में लिखा से मरने के बाद शरीर के सभी अंग सहित अंत्येष्टि किया जाना चाहिए तभी आत्मा को शांति ---- ???
मालती ---किस युग में जी रही हो तुम  ??जानती  हो कुछ बीमारियों में जिंदा  रखने के लिए ऑपरेशन से कुछ अंगों को निकाल देते हैं,एक्सीडेंट में भी अंगभंग हो जाता है। तब....क्या  ???  करना चाहिए बताओ तो ..... मैं तुमसे पूछती हूँ कि वर्तमान की जिंदगी ज्यादा जरूरी है या। मौत के बाद का तथाकथित पुनर्जन्म?
   मेरी प्यारी सखी  रश्मि मरने के बाद  अगले जन्म में
 हमे इस जन्म के कर्मानुसार जन्म मिलेगा ठीक है न?
हमने दो दिन पहले क्या खाया?क्या पहना यह याद नही रहता,तो पूरी जिंदगी भर,क्या -क्या पुण्य या पाप किये  कैसे याद रख सकते हैं -?
 * जो बीत गई सो बात गई अतः जब  जागे तभी सबेरा *
                2020 से 2021के बीच वैश्विक महामारी में हमारे  अनेक रिश्तेदार,मित्र ,बेटे,बेटियां,परिचित ,पड़ोसी मृत्यु के भेंट चढ़ गए ,जिनकी बॉडी तक नहीं मिली। क्या बूढ़े क्या जवान सभी काल के गाल में समा गए।
    मालती सुन ध्यान से  ---  पिछले कुछ दिनों से सुबह शाम मेरी आत्मा मुझसे कहती है --जाग रश्मि जाग  अगर अब भी कुछ  परोपकार -दान नहीं कर पाई तो कब करेगी ? जीवन के सन्ध्या काल में भी जग हित के लिए कुछ तो कर लें ...  इतनी शिक्षा और समझदारी पर लानत है ....यदि अब भी कुछ न कर पाई तो ......
 बुद्धजीवी कहलाती हो , इतनी भयंकर महामारी में भी 65 की उमर में  ईश्वर ने शायद इसीलिये स्वस्थ रखा है कि अब कुछ ऐसा कर लो कि अंत काल में पछताना न पड़े  .......
                 अपने जन्म  को नहीं तो मरण को तो  सार्थंक  करती... जा .....  ओ  .....
          बस उसी आवाज से प्रेरित हो कर प्रतिपदा यानी
भारतीय नव वर्ष को ही विक्रम संवत आरम्भ के शुभ दिन 
में देहदान का फार्म जमा करूंगी ।अब तुझे जो समझना है वो समझ ले .......
 मालती ---- रश्मि तूने मेरी आँखें खोल दी । मेरे लिए भी एक फार्म लेती आना  । हम दोनों एक साथ  एक साथ देहदान का फॉर्म जमा करंगे ।

डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर छ ग

Monday, 19 July 2021

छंद रचना के नियम भाग 3 :-----द्विगुणित पद पादाकुलक /राधेश्यामी/मत्त सवैया ' (सममात्रिक छंद) ,


     
संरक्षक परम श्रद्धेय प्रो.विश्वंभर शुक्ल जी एवम् सुधी मंच को सादर निवेदित प्रदत्त छंद पर आधारित गीत :-
प्रदत्त छंद - ' द्विगुणित पद पादाकुलक /राधेश्यामी/मत्त सवैया  ' (सममात्रिक छंद). 
विधान - 16,16 =32 मात्रा , आदि में गुरु अनिवार्य. 
यदि आदि में द्विकल के बाद त्रिकल आता है तो एक और त्रिकल रखकर दो चौकल बनते हैं. 
********************************************प्रदत्त छंद पर आधारित गीत :-
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जय-जय जय-जय भारत माता, तव वंदन मैं निशिदिन गाता |
तेरा आँचल भाये  मुझको,  सुख  वैभव  सब  मैं  पा  जाता ||
~
सुंदर रूप अनोखा जग में, गाती  दुनिया  तेरे  गाने |
सबको भाता वेश तुम्हारा, सब गाते हैं नवल तराने ||
तव गुण गाऊँ तुम्हें मनाऊँ, सुंदर जग में अपना नाता |
तेरा आँचल भाये मुझको, सुख वैभव सब मैं पा जाता || 
~
माता वंदन तव अभिनंदन,  सबको चरण-धूलि है  चंदन |
रखना माता ममता सुंदर, कट जायें अब सब छल-छंदन ||
साक्षी  आज  बने  हैं  सुंदर,  नीला  अंबर  धरती  माता |
तेरा आँचल भाये मुझको,  सुख वैभव सब मैं पा जाता ||
~
देना खुशियाँ सबको माता, हम याचक  झोली  फैलाते |
जन्में माता तव चरणों में, हम सब तुझको सदा मनाते ||
भाती शस्य श्यामला मूरत,  रक्षक तुंग हिमालय भाता |
तेरा आँचल भाये मुझको, सुख वैभव सब मैं पा जाता ||
जय-जय जय-जय भारत माता, तव वंदन मैं निशिदिन गाता ||श्यामराव धर्मपुरीकर ।।


Sunday, 11 July 2021

लघुकथा श्रृंखला क्रमांक ---39 … आखिर तू तू -मैं मैं क्यों?, नववधू का गृहप्रवेश,. हमारा पहचान पत्र है अभिवादन , नामकरण वंदिता का ,

": बिटिया अल्पायु  है"

          वर्तिका मन्दिर के पुजारी की  पोती है । चार बेटे के बाद जन्मी है ।  घर आंगन जगमगा उठा। ढोलक की थाप पर  पड़ोस की  रज्जो चाची के खनकते स्वर में सोहर  गीतों से दूर तक अजवाइन हल्दी और सोंठ की खुशबू बिखर गई ।  तो पता चला कि छट्ठी भी हो गई ।  बारह दिन में बारसा  भी  पूरे  पारम्परिक ढंग से मनाया गया ।  सवा महीने में नामकरण  के लिए ज्योतिषी जी को बुलाया गया   व अक्षर से नाम निकला तो वर्तिका नाम रखा गया । पुकारने का नाम मिला वीरा  .... यह कहानी बड़ी नानी याने वीरा  की बुआ  उसकी पोती श्रद्धा से बता रही है ।
    दादी   ने  ज्योतिषी जी से वीरा के भविष्य क बारे में पूछने पर बताया  --- कन्या बड़ी भाग्यवान है । अच्छे घर वर का योग है   बस जीवन  की अवधि  बहुत कम  बता रहा है। कुल मिला कर कन्या अल्पायु है।
 ये तो हमने ग्रह नक्षत्रों की गणना केआधार पर बताया है । हस्तरेखा विज्ञानी  जो ज्योतिषी के बहनोई लगते थे,  उन्होंने ने
 भी  आठ साल की वीरा का हाथ देख कर बताया - कि उसकी जीवन रेखा बहुत छोटी  और कटी  हुई है ।
        अल्पायु योग के कारण  दादा दादी की जिद से मात्र  तेरह बरस की उम्र में ही  गांव के  सुसम्पन्न पुरोहित जी के पन्द्रह वर्षीय बेटे  नीलमणि से वीरा की शादी कर दी गई।नीलमणि के वृद्ध  दादा - दादी की भी उत्कट इच्छा  है- कि परपोते का मुंह देख लें तो सोने की सीढ़ी चढ़ कर  स्वर्ग  जाएंगे । दो साल बाद वीरा का गौना करा दिया गया । वीरा की शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई थी। बाईस की उम्र होते तक वह चार बच्चों की माँ बन गई ।  लातूर  नामक शहर के पास ही वीरा का ससुराल था। दैवयोग से लातूर में  महा विनाशकारी भूकंम्प आया । वीरा उस समय अपने दो  छोटे बच्चों को साथ लेकर रक्षाबन्धन पर्व पर अपने  भाइयों को राखी बांधने पीहर आई हुई थी । इधर भूकंम्प में उसके ससुराल में पूरा गांव  का गांव  जमीन के अंदर धंस गया । घर मकान परिवार वाले कोई भी नहीं बच पाये।
                       वीरा की दुनियां ही उजड़ गई । उसे सामान्य होने में चार साल लगे ।धन्नो बुआ की एक ही बेटी है  शादी के बाद से ससुराल चली गई है ।बुआ के पास खाने पहनने की कमी नही है।अकेली रहती हैं भाई से कहकर वीरा को अपने पास  ले आई । वक्त गुजरा ,माहौल बदला , अब उसे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होने लगी। उसे ये बात समझ मे आने लगी कि  माँ बाप के  जीवित रहते तक ही मायके में पूछ-परख रहती है ।  वह भाइयों पर बोझ नही बनना चाहती है। बुआ के घर किराये में स्कूल की मेडम रहती है । उसने वीरा को सर्वशिक्षा अभियान से जोड़ा ,वयस्क शिक्षा के बारे में बताया ।  उसने बड़ी मेहनत से पढ़ाई  की । 
                  मेडम के मार्गदर्शन में  दसवीं ,बारहवीं की परीक्षा पास कर ली अब तो उसके दोनों बेटे भी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। उसे आंगनबाड़ी में ग्राम सहायिका की नौकरी मिल गई । बुआ ने आसरा दिया । शिक्षाऔर नौकरी ने आत्मविश्वास दिया । पिता ने दो एकड़ खेती बेटी के नाम कर दी । जब वीरा के बेटे भी कमाने लगे तो सही उम्र में उनकी शादी करवा दिया गया।  
            ज्योतिषी जिसे अल्पायु  बताया करते थे। अब वही वीरा 65 साल की दादी बन गई  है। वह समाजसेवा से जुड़ कर   सेवा और सहायता का ऋण उतार रही है ।
 डॉ चंद्रावती नागेश्वर
रायपुर छ ग
 दिनांक 11, 7, 2021

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 शीर्षक -ये तू तू -मैं मैं क्यों?

पति देव तो बड़े अक्खड़ मिजाज के हैं। मेरी तो कुछ सुनते ही नहीं ----- ऐसा बड़बड़ाते पुष्पा  अपने बहते हुए आंसू पोंछती हुई, घर के बाकी काम जल्दी जल्दी   निपटाने लगी इनकी इसी आदत से समझौता करके  जिंदगी गुजारनी होगी।  मैं घर  में अशान्ति  नहीं चाहती, क्या करूँ ???   ऐसा सोच ही रही थी इतने में दरवाजे की घन्टी बजी तो देखा उसकी सहेली अलका मुस्कुराती खड़ी है । 
पुष्पा -अरे अंदर आएगी ...  कि बाहर ही खड़ी रहेगी ?
अलका -- ऐसी रोनी सूरत बना के बुलाएगी तो भीतर कैसे आऊं ? थोड़ा मुस्कुरा के गले तो लगा।  
   दोंनो एक दूसरे से गले गकर साथ साथ सोफे पर बैठी। फिर पूछा --.अब बता तेरा मूड क्यों उखड़ा हुआ है ? 
  पुष्पा --  अरे क्या बताऊँ?? वही बढ़ते बच्चों की परेशानी ,पति का तुगलकी फरमान ,असहयोग ,  शांति से कोई बात  न सुनना न समझना ....  मैं अकेली क्या क्या करूँ ? समझ ही नहीं आता।
 अलका-- वाकई तुझे देखकर ऐसा लगता है ,कि कहाँ फँस गई मेरी बेस्ट फ्रेंड  कालेज के जमाने की  *सावन क्वीन* पढ़ाई ,नृत्य, गीत में अव्वल रहने वाली  *यथा नाम तथा गुण* तेरे चेहरे पर फूलों  सी मुस्कान सदा खिली रहती । 
पुष्पा -- बस बस अब उन दिनों की याद मत दिला, वो तो जीवन का गुजरा हुआ अध्याय है। जिसे  वापस नहीं लाया जा सकता । अब तो हमे सोचना है कि जिंदगी की इस अध्याय को कैसे खुशरंग बनाया जाए ।
                       अलका-- ये अच्छा हुआ कि तेरा -मेरा
ससुराल एक ही शहर में हैं ,तो जब मन हुआ एक दूसरे से मिल कर दिल की बातें कर लेते हैं।यार मैं तुझे इस बात की दाद देती हूँ कि  हर परिस्थिति के तू खुद को ढाल लेती है । मुझमे तो इतना धैर्य नहीं है ।
   अब ये भी तो बता दे कि - मैं आई तब तू किस बात से इतनी अपसेट थी .....
पुष्पा --  मैं चाहती हूं कि बच्चों के भविष्य के बारे में हम दोनों  आपसी मतभेद और अहम के घेरे से निकल कर गम्भीरता से सोचें, विचारविमर्श करें  इसके लिए मैं अपने पतिदेव से जब  भी बात करना चाहती हूं  वे समय ही नहीं देते ।आफिस जाने से पहले नाश्ते के बाद  कुछ कहना चाहती हूं ,तब कहते हैं अभी नहीं, शाम को चाय के बाद कहूँ , कहते है अभी नही , डिनर केबादभी नहीं। छुट्टी के दिन कहते है हफ्ते भर में आज तो आराम का दिन  है ,आज तो कतई नही --  तो कब कहूँ इनसे ? 
        मेरी समस्या, मेरी परेशानी को सुनने समझने के लिए कभी वक्त ही नहीं मिला इन्हें।  अब बच्चों के लिए भी वही रुख अपना रहे हैं। 
 अबतो पानी सिर से ऊपर  निकला जा रहा है। 
 मैं सोचती हूँ ,कि कोई भी मसला पति- पत्नी  शांति से बैठ का सुलझा सकते हैं। उसके लिए तू तू - मैं मैं करना  ऊंची आवाज में  बोलना जरूरी नहीं है  ।थोड़े दिन की जिंदगी को आपस मे मिल जुल कर हंसी खुशी से  गुजारा जा सकता है।
  अलका  बोली--लेकिन अब  अपना रौद्र रूप दिखाना ही पड़ेगा --तभी काम बनेगा  ???????
          पुष्पा के पति किसी काम से घर आये थे उन्होंने   उनकी अधिकांश बातें सुन ली और उन्हे अपनी गलती का एहसास हुआ  । दोनो सहेलियां अपनी बातों में इतनी मशगूल थी कि उन्हें पता ही नहीं चला  ------- 
 फिर उन्हें तू तू -मैं मैं की जरूरत नहीं पड़ी ।.....

 डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
रायपुर     छ ग
दिनांक 11  ,6, 2021   
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         "गृहप्रवेश समारोह"  
                
            शुभम और शिशिर  अमेरिका से आये हैं।अपने चाचा के घर रायपुर में रुके हैं। इस सन्डे उन्हें  कार में तीन घण्टे का सफर करके  डोंगरगढ़ के पास ही देवकट्टा गाँव में नानी के घर जाना है ।  वहाँ उनके ममेरे भाई की पत्नी यानी कज़िन सिस्टर इन लॉ का होम एंट्रेस सेरेमनीै है। याने कि "गृहप्रवेश समारोह"  होने वाला है।
            नानी ने बताया कि --  दोनो भाइयों को भारतीय परम्पराओं ,रीति रिवाजों को जानने देखने,समझने में बहुत ज्यादा रुचि है। वे बचपन में अपनी नानी - दादी के संरक्षण में पले हैं । उनकी माम् और डैड दोनो डॉक्टर हैं ।उनके पास भले ज्यादा समय तो नहीं होता था ।पर इस बात का ध्यान रखा  गया कि बच्चों को नानी -दादी का संरक्षण और मार्ग दर्शन मिले  । 
      जब शिशिर और शुभम छोटे थे , तब उनकी नानी और दादी बारी बारी से  उनके घर  अमेरिका जाया करते रहें हैं ।  हिंदी ही बोली जाती है। इन बुजुर्गों के की देख रेख में  ये बड़े हुए। गणेश पूजा, दुर्गा पूजा,  जन्माष्टमी,होली, दिवाली रक्षाबंधन   ये वहां के भारतीय परिवारों के साथ मंदिर में मनाया करते हैं। ये लोग u s में आपस मे हिंदी बोलते हैं।
          यहां  पर नानी के घर  में बड़ी गहमा -गहमी है। लोगों का आना जाना लगा हुआ है । बारात पहुंचने मेंअभी कुछ देर है  दोनो भाइयों को भारतीय रीतिरिवाज के बारे में जानने की ललक है।
              पंडित जी आ चुके हैं। बारात आने में शायद  पौना घण्टा लगे। नानी ने   दोनों भाइयों को पंडित जी के पास बैठा दिया। उन्होंने पंडित जी  को  प्रणाम  किया और
  पूछा  --- पंडित जी हम  जानना चाहते हैं कि--- गृह प्रवेश क्यों होता है?? 
 पण्डित जी  बोले --- गृह  प्रवेश दो तरह का होता है । पहला नए बने मकान में  पुराने   व्यक्तियों का  प्रथम प्रवेश ।
 दूसरा -- पुराने मकान में  नए व्यक्तियों का प्रवेश । (जैसे नव वधू या  दामाद के रूप में प्रथम आगमन) नए  रिश्ते में बंधे  व्यक्ति का प्रवेश । 
यह  जीवन ऊर्जा को उन्नत बनाने की प्रक्रिया है। शादी का मतलब  सिर्फ स्त्री पुरुष का रोमांस नही हैं। 
 यह दो व्यक्तियों के साथ दो परिवारों का  जीवनभर के लिये सुख दुख में साथ बने  रहने का गठबंधन है। सही मुहूर्त में हँसी खुशी के  माहौल में नई ऊर्जा के साथ उत्साह उमंग  से पूरित आनंदित मन से  घर के भीतर के भीतर कदम रखा  जाता है। मन में ईश्वर के प्रति  कृतज्ञता का भाव और मंगल कामना की जाती है - कि यह स्थान   हमार लिए मंगल कारी  हो ।  यहाँ रहते हुए हम फूलें  फलें, हर तरह से समृद्ध   बनें, सुख शांति मिले। घर को स्वच्छ और पवित्र करके वेद मंत्रों द्वारा प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है।  
-- --- ऐसा नहीं करने से क्या नुक्सान होता है पण्डित जी ??
       यह प्राक्रिया वैसे ही है जैसे धरती में पौधा लगाना  मिट्टी पर्याप्त समृद्ध और उपजाऊ हो, पर्याप्त जलसींचन की व्यवस्था हो , हानिकारक कीटों और पशुओं से सुरक्षा हो । 
      मुझे अफसोस है , बच्चों  कि जिस तरह की रुचि और जिज्ञासा तुम्हारे मन में अपनी भारतीय संस्कृति को जानने समझने की है ....वैसी प्रवृत्ति  आज तक इस देश के युवाओं ,बड़े बुज़ुर्गों  के मन हो ,ऐसा मैंने महसूस नहीं किया है ???
        पिछले आठ नौ सौ सालों से  यही सब इस देश के लोग भुलाते जा रहें हैं।  इसीलिए हमारी पीढ़ी उत्तरोत्तर मतिहीन, गतिहीन,  चिन्तनहीन, कर्तव्य विमुख, उत्साहहीन,उदासीन होती जा रही है
          ये वे परम्पराएं हैं, जो जीवन दर्शन का भंडार समेटे हुये हैं ।जिसने आत्मज्ञानियों की  लम्बी कतार पैदा की है ।
 हम क्या खाते हैं, कया सोचते है  कहां रहते है,इसके आधार पर असाधारण बुध्दि वाले  अत्यंत ऊर्जावान पीढ़ी की फौज तैयार कर सकते हैं ।
 इनके  भीतर गहन ज्ञान और विज्ञान  भरा है । जो व्यक्ति  की पूरी क्षमता को विकसित करती है। उनकी सफलता की सोच व्यापक होती है ,उन्हें संसारिक रूप से समृद्ध और समाज में सम्मानित होने लायक बनाता है । 
   हमारे पर्व त्यौहार  ,रीति रिवाज समय समय पर हमारे भीतर नई ऊर्जा,नया उत्साह और ताजगी भरते हैं।,हमे रिचार्ज करते रहते हैं  ।रिश्तों को मजबूती देते हैं । 
           अच्छा बच्चों   बारात आ गई है ।कार्यक्रम शुरू होने वाला है ।मुझे जाना होगा ।आप लोगों को भारतीय परम्परा,रीति रिवाज की जो जानकारी चाहिए  तो  मुझे फोन करके पूछ लेना मैं जरूर बताऊंगा  .......
  उन्होंने नववधू का स्वागत सत्कार देखा, आरती तिलक के बाद  कुमकुम घुले  रंग से दरवाजे पर  नववधू की हथेलियों के छाप लगवाए गए , कुम कुम घुले जल भरे परात  में
 मे पांव रख  उन्हें घर के भीतर कदम रखते हुए भीतर जाने कहा गया । दूर तक उनके शुभ पद चिन्ह बनते गए ।जो गृह लक्ष्मी बन हर तरह से इस घर की समृद्धि में भागीदारी  निभाती रहेंगी । मन के भाव से प्रेरित हमारे कर्म होते हैं। कर्म से हमारा जीवन संचालित होता है ------ 
 डॉ चन्द्रावती नागेश्वर
 रायपुर  छ ग 
17, 7  ,2021

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शीर्षक  ----    "हमारा पहिचान पत्र अभिवादन  
                कान्वेंट स्कूल में  दसवीं में पढ़ने वाले  दो मित्र शाश्वत  शुक्ला और निमेष वर्मा शाम को कॉफी हाऊस की ओर जा रहे थे ।उन्हें  सामने से म्यूज़िक टीचर भवानंद शास्त्री आते हुए दिखाई दिए  तो शाश्वत ने कहा - अब इसको नमस्ते करना पड़ेगा।चल अपन उस गली में चलते हैं 
            ऐसे ही एक दिन पड़ोस के त्रिपाठी अंकल  उन्हें देखते हुए बगल से गुजर गए ,पर निमेष  आरव  और सुदीप  एक दूसरे से बात करते हुए जानबूझ कर उन्हें इग्नोर किया । ऐसी घटना प्रायः कई लोगों के साथ घटती है कि सुशिक्षित, सभ्य घर के अच्छे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे बड़े बुजुर्गों, शिक्षकों का अनादर करके ,रास्ता बदल के,उन्हें बिना अभिवादन किये निकल जाते हैं  । 
         दरअसल  अभिवादन  करने के तरीके से व्यक्ति का संस्कार, परवरिश,शिक्षा,पास-पड़ोस के माहौल  का पता चल
जाता है । दिन में पहली बार जब भी हम किसी से मिलते हैं तो एक दूसरे अभिवादन जरूर करना  चाहिए ।
                                यह प्रथा विश्व  के हर देश मे,हर जाति,हरधर्म,हर सम्प्रदाय,  हर भाषा ,हर क्षेत्र में है। सबका तरीका अलग अलग है, लेकिन मकसद एक ही है । परस्पर एक दूसरे का स्वागत और सम्मान करना ,आपसी संवाद की शुभ शुरुआत करना । अभिवादन आपसी परिचय की डोर थाम कर  आपसी रिश्ते जोड़ता है  ।
          प्रायः सभी परिवारों में शैशवकाल से ही  बच्चों को  अपनी परम्परा के अनुसार  अभिवादन करना सिखाया जाता है। अभिवादन के लिए न समय का बंधन है,न रिश्ते का,न पद का,  न उम्र का , न हैसीयत का । कोई भी ,कभी भी, किसी का अभिवादन कर सकता है।   
          एक दिन मेरी नौ वर्षीया  पोती   आस्था ने अपनी मम्मी से पूछ लिया --  मम्मा  मुझे  कल असेम्बली में प्रेयर के बाद   " नमस्ते और   हेलो "  के बारे में बोलना है । आप बताइए न मैं क्या बोलूं ??
         मम्मी --  मुझे अभी काम है, जाओ अपने पापाजी से पूछ लो।
 पापा जी उसेे पड़ोस की केंद्रीय विद्यालय की पास भेज दिया। उन्होंने कहा - बेटा अभी मुझे  मैं कुछ जरूरी काम से बाहर जा रही हूं  कल आना ।  इस तरह आस्था मन्दिर के पुजारी से लेकर अनेक लोगों से पूछा ,पर  सब एक दूसरे पर टालते रहे। किसी ने सन्तोष जनक उत्तर नहीं दिया ।  वह मन्दिर के बाहर बेंच में बैठ गई और सुबकने लगी । वहीं बैठी एक बुजुर्ग महिला ने उससे रोने का कारण पूछा - दादी जी मुझे कल नमस्ते के बारे में बोलना है और कोई   ठीक से  नहीं बता रहा है ..... 
  उस दादी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ---चलो मैं बताती हूँ  --कॉपी पेन लाई हो ??तो लिखो ----
     जब हम किसी से मिलते हैं ,तो बातचीत करने से पहले   ईश्वर  का नाम  लेते हैं , या उसके लिए शुभता की भावना प्रकट करते हुए बातचीत की शुरुआत करते है --  जैसे नमस्ते, जै राम नमस्कार, प्रणाम,चरण स्पर्श,ऐसा कहते हुये मन ही मन उसे सम्मान देते हैं ।
       जय श्री कृष्ण,राधे राधे, जय माता दी ,जय ईशू,, आदि, सिक्ख लोग -- सत श्री अकाल  (काल के बंधन से ऊपर ईश्वर ही सत्य है)। मुस्लिम  लोग--अस्सलाम वा अल्लयेकुम  (खुदा तुम्हें सलामत रखे )  प्रत्युत्तर में कहा जाता है -  वा अल्लएकुम  अस्सलाम(तुम्हें भी खुदा सलामत रखे )
                       नमः  +  ते --नमस्ते  ( उसे नमन याने हमारे भीतर परमात्मा का अंश आत्मा है ,उसे नमन) नमः + कार --नमस्कार  ( कार्य को नमन   --कर्म ही पूजा है )   इसी तरह सभी अभिवादन प्रभु और बड़ों के प्रति सम्मान,  प्रेम ,लगाव दर्शाता है । सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है। सुप्रभात,शुभ संध्या, शुभ रात्रि, में भी यही ध्वनित होता है ।
      बस अंत मे इतना ही कहूंगी --- हम अपनी प्राचीन परम्पराओं  की वैज्ञानिकता को समझने का प्रयास करें उन्हें अपनाएं जो नैतिक पतन से हमे उबरेगा  ,विनम्र बनाएगा,  चरण स्पर्श  , झुक कर प्रणाम  करने से श्रद्धा और दुआ का हस्तांतरण होता है - स्पर्श चिकित्सा पद्धति का उद्गम यहीँ  से हुआ था । नमन से बड़ों का सम्मान भाव विकसित होगा ।
       अभवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः
     चत्वारितस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलं
   डॉ चंद्रावती नागेश्वर
   रायपुर छ ग
 दिनांक 25 , 7 ,2021

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   शीर्षक --" नामकरण वंदिता का "
                   सौम्या आलोक की बेटी आज 40 दिन की हो गई आज उसका नामकरण संस्कार किया जा रहा है । खुशी का माहौल है ।सभी मित्र और परिचितों को आमंत्रित किया गया है ।
मित्र अंशुल ने पूछा  -  यार तेरी बेटी का नामकरण  उसके  पैदा होने के पहले ही कर चुके हो ।फिर यह आयोजन क्यों? 
  आलोक-  उस समय मेरी माँ यहां नहीं थी । अब  वो आ गयी है। हमारी इच्छा है ,कि भारतीय तरीके से  सभी मित्रों की उपस्थिति में उसका नामकरण  कार्यक्रम हो । ताकि हम और हमारे बच्चे अपनी परम्परा और रीति रिवाजों को देखें ,जानें, और समझें। 
रचना -- ठीक किया  आलोक। हम तो भारत के महानगरों में पले बढ़ें हैं । हमे भी इसके बारे क़ुछ नहीं पता। 
         हवन की तैयारी हो चुकी है  सारे लोग हॉल में यथा स्थान बैठ चुके हैं। तभी 12वर्षीय साहिल  ने पूछा -  नाम करण क्यों होता है ??  दादी ने कहा -गुड क्वेश्चन  --   अगर किसी का कोई नाम न हो तो हम उसे पुकारेंगे कैसे ?? जहाँ बहुत सारे लोग उपस्थित हों तो किसी काम मे लिए कैसे बुलाएंगे ? उसे  इशारों से भी कैसे पता चलेगा कि   उसे ही जाना है ?
               न+आम - नाम अर्थात  जो आम या सामान्य न होकर खास हो ,औरों से अलग हो ।  जब  एक उम्र ,एक रंग ,एक जाति  के बहुत से  लोग हों,तो उन्हें नाम से ही पहचान सकते हैं।एक नाम के एक से अधिक हो सकते हैं ,पर ज्यादा नहीँ  । तब उन्हें उनके उपनाम या पिता के नाम से भी पहचान सकते हैं  । नाम हर व्यक्ति  को  समूह से एक अलग पहिचान देता है ।
जब नाम नहीँ पता होता तो उसके कपड़ों के रंग उसके अपने रंग ,  रूप ,ऊंचाई , मोटाई से बुलाया जा सकता है जैसे :- लम्बू ,छोटू,कालू , मोटू  भुरू ,आदि । पर ऐसे सम्बोधन उन्हें  पसंद नहीं आते । इसीलिए माता पिता बच्चों को अच्छा सा नाम देते हैं । यह नाम उसे अन्य लोगों से अलग पहचान देती है ।    
 सुवर्णा --   दादी नाम कुछ भी रखा जा सकता है न ?  फिर कैसे पता चलता है, कि  कोई नाम अच्छा या बुरा है ? 
             हर माता - पिता का चाहते हैं कि उसका बच्चा  अच्छे काम करे ,अच्छा व्यक्ति बने ,सब उसको प्यार करें ,सब उसे सम्मान दें ।  इसीलिए  प्रसिद्ध व्यक्ति ,प्रसिद्ध स्थान,गुणवान, चरित्रवान लोगों के नाम पर अपने बच्चों का नाम रखते हैं। कुछ लोग साहित्यिक ,कुछ धार्मिक नाम रखते हैं ।
                    हर शब्द का अर्थ होता है।शब्द अगर शरीर है तो अर्थ उसकी आत्मा होती है । अतः  अच्छे अर्थ वाले शब्दों को ही नाम के लिए चयन करना चाहिये ।   गप्पू,टप्पू, मल्लू ,टिल्लू, बल्लू कल्लो, कचरा,काना,लूला , घसिया ,  घोंचू, लल्लू, जैसे निरर्थक नाम नहीं रखना चाहिये ।
                          सार्थक  नाम से  व्यक्ति के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता हैं यदि नाम सुंदर,सहज, सरल  मोहक और सार्थक हो तो बोलनेऔर सुनने वालों को  अच्छा लगता है। हर माता -पिता चाहते हैं कि उनकी संतान आगे चलकर उनके कुल परिवार का नाम रोशन करने वाला बने ,  उन्हें  अपनी सन्तान पर गर्व हो ।उनका बच्चा विशिष्ट व्यक्तित्व का स्वामी बने । तो बहुत सोच समझ कर उसका नाम रखें ।उसे उसके नाम का अर्थ बताइये। 
         नाम से व्यक्ति को भीड़ से अलग पहिचान मिलती है । और व्यक्ति से नाम  की आन और शान बढ़ती है।
       नाम अगर अपनी मातृ भाषा, अपनी संस्कृति,अपने परिवेश  के अनुकूल हो तो बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता हैं । नाम का अर्थ उसके अन्तः करण को उद्वेलित करता है।उसे अच्छे कर्म करने को प्रेरित करता है।  
           नामकरण की हर जाति ,धर्म , क्षेत्र ,और देश में अलग अलग परम्परा है ।कहीं घर के बड़े बुजुर्ग ,कहीं पुजारी कहीं माता पिता बच्चे का नामकरण करते हैं।  पहले के जमाने में देवी -देवता के नाम पर बच्चों के नाम होते थे ताकि बच्चे को पुकारते  थे तो भगवान को याद कर लेते थे।,कुछ लोग सिनेमा /टी वी सीरीयल के पसंदीदा किरदारों के नाम रखते हैं,कुछ राजा महाराजा के  जैसे बने यह सोच कर नाम रखते हैं, आजकल गूगल से सर्च करकेलेटेस्ट,यूनीक,मार्डन नाम रखने का प्रचलन बढ़ा है।
किसी पौधे की डाल काट कर दूसरी मिट्टी में रोप देने से  ऊंचीवहाँ उसके  जड़ पकड़ने की संभावना कम होती है  ।यदि जड़ निकल भी गई तो पौधा दीर्घजीवी नहीं होता, अच्छी तरह से फलता फूलता नहीं ।
         यदि हर माता-पिता चाहते हों कि उनका बच्चा  आम या सामान्य न होकर  खास  व्यक्तित्व वाला हो ,तो उसका नाम भी विशिष्ट हो।ऊंची सोच रखें दूरदर्शिता से कामलें।
जैसी सोच वैसा प्रभाव ।जैसा बीज वैसी पौध ।                       आज भी लोग रावण,कैकयी, मन्थरा,कंस  सूर्पनखा नाम इसीलिए नहीं रखते  हैं। नाम का मनोवैज्ञानिक प्रभाव मन मे गुंजित होता रहता है ।   
           अंत में हवन पूजन के बाद  फ़ूलों से सजी एक थाली में   अक्षत चिपका कर  "  वन्दिता" लिखकर उसपर लाल चुन्नी ढंककर   रखा गया था । बच्चे को माता की गोद मे देकर अक्षत कुमकुम से पूजित करके दादी के द्वारा चुन्नी हटा कर नाम की घोषणा हुई । सबने ताली बजाकर हर्ष प्रगट किया । बच्ची को शुभकामना,आशीष दिया ।
   डॉ चन्द्रावती नागेश्वर 
    रायपुर  छ ग
    दि . 31  ,07  ,2021
















सके
[30/07, 21:12] Chandrawati: " नाम कारण नायरा का  "
सौम्याऔर आलोक की बेटी आज 40 दिन की हो गई आज उसका नामकरण संस्कार किया जा रहा है । खुशी का माहौल है ।सभी मित्र और परिचितो को आमंत्रित किया गया है ।
मित्र अंशुल ने पूछा  -  यार तेरी बेटी का नामकरण  उसके  पैदा होने के पहले ही कर चुके हो ।फिर यह आयोजन क्यों? 
  निशांत -  उस समय मेरी माँ यहां नहीं थी । अब  वो आ गयी
है।भारतीय तरीके से  सभी मित्रों की उपस्थिति में उसका नामकरण  कार्यक्रम हो । ताकि हम और हमारे बच्चे अपनी परम्परा और रीति रिवाजों को देखें ,जानें, और समझें। ।
रचना -- ठीक किया  निशांत हम तो भारत के महानगरों में पले 
बढ़ें हैं । हमे भी इसके बारे क़ुछ नहीं पता। 
         हवन की तैयारी हो चुकी है  सारे लोग हॉल में यथा स्थान बैठ चुके हैं। तभी 12वर्षीय साहिल  ने पूछा -  नाम करण क्यों होता है ??  दादी ने कहा -गुड़ क्वेश्चन  --   अगर किसी का कोई नाम न हो तो हम उसे पुकारेंगे कैसे ?? जहाँ बहुत सारे लोग उपस्थित हों तो किसी काम मे लिए कैसे बुलाएंगे ? उसे  इशारों से भी कैसे पता  चलेगा कि   उसे ही जाना है ?
               न+आम - नाम अर्थात  जो आम या सामान्य न होकर खास हो ,औरों से अलग हो ।  जब  एक उम्र ,एक रंग ,एक जाति  के बहुत से  लोग हो तो उन्हें नाम से ही पहचान सकते हैं।एक नाम के एक से अधिक हो सकते हैं पर ज्यादा नहीँ  ।उन्हें उनके उपनाम या पिता के नाम से भी पहचान सकते हैं   नाम हर व्यक्ति  को ए के अलग पहिचान देता है ।
जब नाम नहीँ पता होता तो उसके कपड़ों के रंग उसके अपने रंग ,  रूप ,ऊंचाई , मोटाई से बुलाया जा सकता है जैसे :- लम्बू ,छोटू,कालू , मोटू  भुरू ,आदि । पर ऐसे सम्बोधन उन्हें  पसंद नहीं आते । इसीलिए माता पिता बच्चों को अच्छा सा नाम देते हैं । यह नाम उसे अन्य लोगों से अलग पहचान देती है ।    
 सुवर्णा --   दादी नाम कुछ भी रखा जा सकता है न ?  फिर कैसे पता चलता है, कि  कोई नाम अच्छा या बुरा है ? 
             हर माता - पिता का चाहते हैं कि उसका बच्चा  अच्छे काम करे ,अच्छा व्यक्ति बने ,सब उसको प्यार करें ,सब उसे सम्मान दें ।  इसीलिए  प्रसिद्ध व्यक्ति ,प्रसिद्ध स्थान,गुणवान, चरित्रवान लोगों के नाम पर अपने बच्चों का नाम रखते हैं।
                    हर शब्द का अर्थ होता है।शब्द अगर शरीर है तो अर्थ उसकी आत्मा होती है । अतः  अच्छे अर्थ वाले शब्दों को ही नाम के लिए चयन करना चाहिये ।   गप्पू,टप्पू, मल्लू ,टिल्लू, बल्लू कल्लो, कचरा,काना,लूला , घसिया ,  घोंचू, लल्लू, जैसे निरर्थक नाम नहीं रखना चाहिये ।
                          सार्थक  नाम से  व्यक्ति के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता हैं।
[30/07, 21:56] Chandrawati: यदि नाम सुंदर,सहज, सरल  मोहक और सार्थक हो तो बोलनेऔर सुनने वालों को  अच्छा लगता है। हर माता -पिता चाहते हैं कि उनकी संतान आगे चलकर उनके कुल परिवार का नाम रोशन करने वाला बने ,  उन्हें  अपनी सन्तान पर गर्व हो ।उनका बच्चा विशिष्ट व्यक्तित्व का स्वामी बने । तो बहुत सोच समझ कर उसका नाम रखें ।उसे उसके नाम का अर्थ बताइये। 
         नाम से व्यक्ति को भीड़ से अलग पहिचान मिलती है । और व्यक्ति से नाम  की आन और शान बढ़ती है।
       नाम अगर अपनी मातृ भाषा, अपनी संस्कृति,अपने परिवेश  के अनुकूल हो तो बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता हैं । नाम का अर्थ उसके अन्तः करण को उद्वेलित करता है।उसे अच्छे कर्म करने को प्रेरित करता है।  
           नामकरण की हर जाति ,धर्म में हर क्षेत्र ,और देश में अलग अलग परम्परा है ।कहीं घर के बड़े बुजुर्ग ,कहीं पुजारी
 कहीं माता पिता बच्चे का नामकरण करते हैं।  पहले के जमाने में देवी -देवता के नाम पर बच्चों के नाम होते थे ताकि बच्चे को पुकारते तो भगवान को याद कर लेते ,कुछ लोग सिनेमा /टी वी सीरीयल के पसंदीदा किरदारों के नाम रखते हैं,कुछ राजा महाराजा के  जैसे बने यह सोच कर नाम रखते हैं, आजकल गूगल से सर्च करके लेटेस्ट,यूनीक,मार्डन नाम रखने का प्रचलन बढ़ा है।
[30/07, 22:25] Chandrawati: किसी पौधे की डाल काट कर दूसरी मिट्टी में रोप देने से   वहाँ उसके  जड़ पकड़ने की संभावना कम होती है  ।यदि जड़ निकल भी गई तो वह दीर्घजीवी नहीं होता, अच्छी तरह से फलता फूलता नहीं ।
             आज भी लोग रावण,कैकयी, मन्थरा,कंस  सूर्पनखा नाम क्यों नहीं रखते ?  नाम का मनोवैज्ञानिक प्रभाव मन मे गुंजित होता रहता है ।   
                 हवन पूजन के बाद  फ़ूलोंसे सजी एक थाली में   अक्षत चिपका कर  "  वन्दिता" लिखकर उसपर लाल चुन्नी ढंककर   रखा गया था । बच्चे को माता की गोद मे देकर    अक्षत कुमकुम से पूजित करके दादी के द्वारा चुन्नी हटा कर नाम की घोषणा हुई । सबने ताली बजाकर हर्ष प्रगट किया । बच्ची को शुभकामना,आशीष दिया ।
   डॉ चन्द्रावती नागेश्वर 
    रायपुर  छ ग
    दि . 31  ,07  ,2021







 मायके से विदा होकर बैंड बाजा बारातियों के साथ   दुल्हन बनी वसुधा पिया के घर  पहुंची ।  घर    के दरवाजे पर सास आरती की थाल लिए खड़ी हैं ।   मंगल गीत की ध्वनि से वातावरण खुशनुमा है । वर वधू की आरती उतारी गई   मंगल तिलक लगाया गया। बलइयां ली गई न्योछावर डाले गए ।